O Romeo Review In Hindi: बदले की कहानी में भटके शाहिद कपूर, जानें कैसी है ‘ओ रोमियो’
🎬 फिल्म: ओ रोमियो
- निर्देशक: Vishal Bhardwaj
- लीड स्टार: Shahid Kapoor, Triptii Dimri
- सह-कलाकार: Nana Patekar, Avinash Tiwary, Farida Jalal, Disha Patani, Tamannaah Bhatia
- प्रोडक्शन: Nadiadwala Grandson Entertainment
- रिलीज डेट: 13 फरवरी
📖 कहानी की झलक
फिल्म की शुरुआत 1995 के मुंबई अंडरवर्ल्ड बैकड्रॉप से होती है। नाना पाटेकर ‘खान साब’ के किरदार में हैं, जबकि फरीदा जलाल शाहिद कपूर की दादी के रोल में दिखती हैं।
कहानी बदले, गैंगवार और इमोशनल ड्रामा के इर्द-गिर्द घूमती है। तृप्ति डिमरी की एंट्री एक अलग ट्रैक लेकर आती है, जो शाहिद के किरदार को सुपारी देती है।
इंटरवल तक फिल्म एक औसत गैंगस्टर ड्रामा लगती है, लेकिन बाद में कहानी लव स्टोरी की तरफ मुड़ जाती है — जहां फिल्म का टोन असंतुलित महसूस होता है।
🎭 एक्टिंग कैसी है?
⭐ शाहिद कपूर
शाहिद कपूर का फाइट सीन बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ फिल्म Animal की याद दिलाता है। हालांकि उस स्तर का प्रभाव नहीं बन पाता। कई जगह उनका प्रदर्शन ओवर-द-टॉप लगता है।
⭐ नाना पाटेकर
नाना पाटेकर अपने अनुभव से स्क्रीन पर भारी पड़ते हैं। उनके संवाद और स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को मजबूती देते हैं।
⭐ तृप्ति डिमरी
तृप्ति डिमरी की भूमिका अलग लेयर जोड़ती है, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें पूरा स्पेस नहीं देती।
⭐ अविनाश तिवारी
गैंगस्टर जलाल के किरदार में प्रभावी, लेकिन स्क्रीन टाइम सीमित।
🎬 डायरेक्शन और स्क्रीनप्ले
विशाल भारद्वाज हमेशा अलग तरह का सिनेमा देने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इस बार कहानी और टोन में संतुलन की कमी दिखती है।
- गालियों और सैक्सुअल संवादों का इस्तेमाल कई जगह जबरन लगता है।
- इंटरवल के बाद फिल्म गैंगस्टर ड्रामा से ट्रैजिक रोमांस की ओर मुड़ जाती है।
- कई सीन में तारतम्य की कमी महसूस होती है।
🎵 म्यूजिक और टेक्निकल पक्ष
बैकग्राउंड स्कोर दमदार बनाने की कोशिश करता है, लेकिन कहानी की कमजोरी को पूरी तरह ढक नहीं पाता। सिनेमैटोग्राफी ठीक-ठाक है, पर फिल्म की लंबाई और एडिटिंग कसावट मांगती है।
⭐ रेटिंग: 2/5
क्यों देखें?
अगर आप शाहिद कपूर या विशाल भारद्वाज के फैन हैं और डार्क गैंगस्टर ड्रामा पसंद करते हैं।
क्यों न देखें?
अगर आप मजबूत कहानी और सुसंगत स्क्रीनप्ले की उम्मीद कर रहे हैं।
‘ओ रोमियो’ में दमदार स्टारकास्ट और दिलचस्प कॉन्सेप्ट होने के बावजूद फिल्म अपनी पकड़ बनाए रखने में चूक जाती है। नाना पाटेकर का अभिनय याद रह जाता है, लेकिन शाहिद कपूर की यह फिल्म उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती।