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नाबालिग से दुष्कर्म पर न्याय का सख्त संदेश, पोक्सो कोर्ट ने सुनाई आजीवन कारावास की सजा…

अलवर में नाबालिगों के खिलाफ अपराधों पर कड़ा रुख अपनाते हुए पोक्सो कोर्ट संख्या-2 ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने 12 वर्ष से कम उम्र की बच्ची से बार-बार दुष्कर्म के दोषी पाए गए 50 वर्षीय आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही आरोपी पर 4 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है, जिसमें से आधी राशि पीड़िता को प्रतिकर के रूप में देने की सिफारिश की गई है।


पोक्सो कोर्ट-2 का कड़ा फैसला, आजीवन कारावास की सजा

पोक्सो कोर्ट संख्या-2 की न्यायाधीश शिल्पा समीर ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए कहा कि यह अपराध केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि एक मासूम बच्ची के पूरे भविष्य पर गहरा आघात है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में कठोरतम दंड ही समाज में भय और न्याय दोनों स्थापित कर सकता है।


चार लाख रुपये का जुर्माना, पीड़िता को मिलेगा मुआवजा

अदालत ने आरोपी पर लगाए गए 4 लाख रुपये के जुर्माने में से 2 लाख रुपये पीड़िता को प्रतिकर के रूप में देने की अनुशंसा की है। शेष राशि राज्य कोष में जमा होगी। कोर्ट ने माना कि पीड़िता को मानसिक और सामाजिक क्षति की भरपाई के लिए आर्थिक सहयोग आवश्यक है।


टॉफी और कोल्ड ड्रिंक का लालच देकर करता रहा शोषण

विशिष्ट लोक अभियोजक पंकज यादव ने अदालत को बताया कि आरोपी ने बच्ची को कोल्ड ड्रिंक और टॉफी देने के बहाने बहला-फुसलाकर अपने घर और अन्य स्थानों पर ले जाकर करीब 10 से 15 बार दुष्कर्म किया। आरोपी ने डर और लालच का इस्तेमाल कर लंबे समय तक अपराध को अंजाम दिया।


“खिलौनों से खेलने की उम्र में छीनी मासूमियत”—अदालत की टिप्पणी

सजा सुनाते समय न्यायाधीश ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोपी ने खिलौनों से खेलने की उम्र की बच्ची की मासूमियत को रौंदा है। इस तरह के अपराध का प्रभाव पीड़िता के मन, मानसिक स्वास्थ्य और पूरे जीवन पर पड़ता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


पिता की रिपोर्ट से खुला मामला, एक साल तक चला शोषण

पीड़िता के पिता ने 12 नवंबर 2024 को अरावली विहार थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। रिपोर्ट में बताया गया कि आरोपी बच्ची को धमकाकर और बहकाकर बार-बार बुलाता था और करीब एक वर्ष की अवधि में कई बार दुष्कर्म किया।


बचाव पक्ष की नरमी की अपील खारिज

सजा निर्धारण के दौरान बचाव पक्ष ने आरोपी की उम्र का हवाला देते हुए सजा में नरमी की मांग की, लेकिन अभियोजन पक्ष ने इसका कड़ा विरोध किया। अदालत ने माना कि अपराध की गंभीरता के आगे आरोपी की उम्र कोई आधार नहीं बन सकती।

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