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ईरान में ‘भूखी’ जनता का उबाल: 35 मौतें, हजारों गिरफ्तार और ट्रंप की मिसाइल चेतावनी


ईरान इस समय अपने हालिया इतिहास के सबसे गंभीर आर्थिक जनआंदोलनों में से एक से गुजर रहा है। बढ़ती महंगाई, गिरती मुद्रा और रोजमर्रा की जरूरतों पर मंडराते संकट ने आम जनता को सड़कों पर ला दिया है। विरोध अब केवल आर्थिक असंतोष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं। इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी सैन्य चेतावनियों ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है।


📉 1. विरोध कितना फैला और कितना हिंसक हो चुका है?

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों की रिपोर्ट के अनुसार, अब तक कम से कम 35 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें 29 प्रदर्शनकारी, चार बच्चे और सुरक्षा बलों के दो सदस्य शामिल हैं।

  • एक सप्ताह से अधिक समय से जारी आंदोलन में 1,200 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया है।
  • ईरान के 31 में से 27 प्रांतों के 250 से अधिक इलाकों तक प्रदर्शन फैल चुका है।

हालांकि सरकार की ओर से आधिकारिक आंकड़े सीमित हैं, लेकिन जमीनी नेटवर्क पर आधारित रिपोर्टिंग अतीत में काफ़ी हद तक सटीक साबित हुई है।


⚠️ 2. ट्रंप की धमकी: चेतावनी या हस्तक्षेप की भूमिका?

स्थिति को और गंभीर बनाती है अमेरिका की कड़ी प्रतिक्रिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि ईरानी सरकार “शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हिंसा” करती है, तो अमेरिका “उनकी रक्षा के लिए आगे आएगा।”
उन्होंने यहां तक कहा कि अमेरिकी मिसाइलें “लॉक एंड लोडेड” हैं।
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका किस रूप में या कब हस्तक्षेप करेगा, लेकिन वेनेजुएला में हालिया अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद इन शब्दों को हल्के में लेना मुश्किल है।


🧨 3. जनता सड़कों पर क्यों उतरी?

ईरान के मौजूदा विद्रोह की जड़ें गहरे आर्थिक संकट में हैं:

  • महंगाई बेकाबू हो चुकी है।
  • रियाल की कीमत ऐतिहासिक रूप से गिर चुकी है—एक डॉलर के मुकाबले लगभग 14 लाख रियाल तक पहुंच चुकी है।
  • व्यापारियों और दुकानदारों ने सबसे पहले राजधानी तेहरान में हड़ताल की, जिसके बाद आंदोलन पूरे देश में फैल गया।

आम लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और यही असंतोष अब राजनीतिक नारों में बदल रहा है।


🗣️ 4. राजनीतिक स्वर: सिर्फ महंगाई नहीं, व्यवस्था पर सवाल

प्रदर्शनों में अब केवल आर्थिक मांगें नहीं उठ रहीं:

  • कुछ लोग सुप्रीम लीडर के शासन को खत्म करने की बात कर रहे हैं।
  • कुछ प्रदर्शनकारी राजशाही की वापसी की मांग भी कर रहे हैं।

यह दर्शाता है कि आंदोलन का स्वरूप धीरे-धीरे आर्थिक विरोध से राजनीतिक चुनौती की ओर बढ़ रहा है।


🕰️ 5. 2022 के बाद सबसे बड़ा उभार

यह आंदोलन 2022 के बाद से सबसे व्यापक माना जा रहा है।
तब 22 वर्षीय महसा अमिनी की पुलिस हिरासत में मौत के बाद देशभर में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे।
हालांकि मौजूदा विरोध अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा है, लेकिन इसकी भौगोलिक व्यापकता और आर्थिक जड़ें इसे उतना ही गंभीर बना देती हैं।


🌍 6. अंतरराष्ट्रीय असर: क्या ईरान अगला भू-राजनीतिक मोर्चा बनेगा?

जैसे-जैसे मौतों और गिरफ्तारियों का आंकड़ा बढ़ रहा है, यह आशंका भी गहराती जा रही है कि कहीं ईरान भी अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संघर्ष का नया केंद्र न बन जाए।
अमेरिकी चेतावनी से यह संकेत मिलता है कि यदि हालात और बिगड़े, तो मानवाधिकारों के नाम पर बाहरी हस्तक्षेप की बहस तेज हो सकती है।
ऐसा हुआ तो यह केवल ईरान का आंतरिक मामला नहीं रहेगा, बल्कि मध्य-पूर्व की स्थिरता और वैश्विक राजनीति पर असर डाल सकता है।


📊 भूख, असंतोष और बाहरी दबाव का खतरनाक संगम

ईरान का मौजूदा संकट तीन स्तरों पर खड़ा है:

  1. आर्थिक पतन – महंगाई और मुद्रा अवमूल्यन ने आम जनता की रीढ़ तोड़ दी है।
  2. राजनीतिक असंतोष – सत्ता संरचना पर खुले सवाल उठने लगे हैं।
  3. अंतरराष्ट्रीय दबाव – ट्रंप की सैन्य चेतावनी से आंतरिक संकट अब वैश्विक तनाव में बदलने का खतरा पैदा कर रहा है।

इतिहास बताता है कि जब घरेलू विद्रोह और बाहरी दबाव एक साथ बढ़ते हैं, तो परिणाम अक्सर अस्थिरता, दमन और दीर्घकालिक संकट के रूप में सामने आते हैं।


ईरान में चल रहा यह विद्रोह सिर्फ महंगाई के खिलाफ गुस्सा नहीं है, बल्कि वर्षों से जमा असंतोष का विस्फोट है। बढ़ती मौतें, हजारों गिरफ्तारियां और अमेरिकी सैन्य धमकियाँ इस संकट को और खतरनाक बना रही हैं।
यदि समाधान संवाद और आर्थिक सुधारों के बजाय दमन और बाहरी हस्तक्षेप के रास्ते से खोजा गया, तो यह संकट केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा—बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता को चुनौती दे सकता है।

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