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कृषि बाजार खोलने पर मंथन: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से किसानों में उम्मीद भी, आशंका भीभारत और अमेरिका के बीच हुए नए व्यापार समझौते के बाद कृषि क्षेत्र को लेकर बहस तेज हो गई है।

जहां एक ओर इसे निर्यात बढ़ाने और नए अवसरों का द्वार खोलने वाला कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर छोटे और सीमांत किसानों के हितों को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।

टैरिफ में बदलाव: पुराने स्तर से अधिक, लेकिन प्रस्तावित दर से कम समझौते के तहत भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में 18 प्रतिशत टैरिफ पर उपलब्ध होंगे। यह दर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित 50 प्रतिशत टैरिफ से काफी कम है, हालांकि पहले के लगभग 3 प्रतिशत औसत शुल्क की तुलना में अधिक मानी जा रही है।

अमेरिका की नजर भारतीय कृषि बाजार पर

अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक लेस्ली रोलिंग्स ने समझौते पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि इससे अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारत के बड़े बाजार में प्रवेश का अवसर मिलेगा। अमेरिका का भारत के साथ कृषि व्यापार में करीब 1.3 अरब डॉलर का घाटा बताया गया है, जबकि कुल कृषि व्यापार घाटा लगभग 50 अरब डॉलर के आसपास है। ऐसे में अमेरिका लंबे समय से भारतीय बाजार में अधिक पहुंच की कोशिश करता रहा है।

भारतीय किसानों की चिंता:

छोटे जोत और बड़ी आबादी
भारत में लगभग 86 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत वर्ग के हैं, जिनकी जोत दो हेक्टेयर से कम है। करीब 10.7 करोड़ परिवार सीधे तौर पर खेती पर निर्भर हैं। आशंका यह जताई जा रही है कि यदि अमेरिकी सब्सिडी वाले कृषि उत्पाद बड़े पैमाने पर भारतीय बाजार में आए तो घरेलू उत्पादों की मांग और कीमतों पर असर पड़ सकता है।

सरकार का दावा: संवेदनशील क्षेत्रों को रखा गया अलग
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट किया है कि समझौते में भारतीय कृषि और डेयरी हितों से कोई समझौता नहीं किया गया है। उनके अनुसार, मुख्य खाद्यान्न—चावल, गेहूं, सोया, मक्का—के साथ ही डेयरी और चीनी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को इस समझौते से बाहर रखा गया है। सरकार का कहना है कि इन क्षेत्रों को ‘रेड लाइन’ मानते हुए संरक्षित रखा गया है।

निर्यात बढ़ने की उम्मीद
भारत पहले से ही चावल, मसाले और समुद्री उत्पादों का बड़ा निर्यातक है। वर्ष 2024 में भारत ने अमेरिका को करीब 6.2 अरब डॉलर के कृषि उत्पाद निर्यात किए, जबकि अमेरिका से 2.4 अरब डॉलर के उत्पाद आयात किए। सरकार का अनुमान है कि नए टैरिफ ढांचे से चावल, मसाले और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में निर्यात बढ़ सकता है, जिससे किसानों, एमएसएमई और मछुआरों को लाभ मिल सकता है।

500 अरब डॉलर की खरीद प्रतिबद्धता

समझौते के तहत भारत अगले पांच वर्षों में अमेरिका से लगभग 500 अरब डॉलर का सामान खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है। हालांकि कृषि क्षेत्र के कई संवेदनशील उत्पादों—जैसे मक्का, गेहूं, चावल, सोया, डेयरी, पोल्ट्री और एथनॉल—को पूर्ण संरक्षण देने की बात दोहराई गई है।

राजनीतिक और आर्थिक संतुलन की चुनौती
कृषि और डेयरी क्षेत्र भारत में बड़े पैमाने पर रोजगार से जुड़े हैं। यही कारण है कि इन क्षेत्रों को लेकर भारत की बातचीत पहले यूरोप और ब्रिटेन के साथ भी संवेदनशील रही है। ऐसे में कृषि बाजार को आंशिक रूप से खोलना आर्थिक अवसरों और ग्रामीण आजीविका के बीच संतुलन साधने की चुनौती बन सकता है।

अवसर और सावधानी साथ-साथ

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता कृषि क्षेत्र के लिए अवसर और सावधानी दोनों का संकेत देता है। जहां निर्यात और निवेश की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, वहीं छोटे किसानों के हितों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण रहेगी। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह समझौता भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था के लिए कितना लाभकारी सिद्ध होता है।

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