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इमरान खान की आंख की रोशनी 85% घटी? सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड बनाने का दिया आदेश


पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पीटीआई प्रमुख इमरान खान की सेहत को लेकर गंभीर दावे सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट में पेश एक रिपोर्ट में कहा गया है कि उनकी दाहिनी आंख की रोशनी 85 प्रतिशत तक कम हो चुकी है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत मेडिकल बोर्ड गठित कर जांच कराने का निर्देश दिया है।


वकील की रिपोर्ट में गंभीर आरोप

इमरान खान के वकील सलमान सफदर ने अदालत में सात पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष अक्टूबर तक उनकी आंखों की रोशनी सामान्य (6/6) थी, लेकिन बाद में दाहिनी आंख में धुंधलापन शुरू हुआ। आरोप है कि जेल प्रशासन को कई बार शिकायत देने के बावजूद करीब तीन महीने तक उचित इलाज नहीं कराया गया।


खून के थक्के से बिगड़ी स्थिति

रिपोर्ट में दावा किया गया कि बाद में जब इस्लामाबाद के पीआईएमएस अस्पताल के नेत्र विशेषज्ञ ने जांच की, तब तक आंख में क्लॉटिंग (खून का थक्का) बन चुका था, जिससे रोशनी गंभीर रूप से प्रभावित हुई। वकील ने अदालत को बताया कि हालिया मुलाकात में इमरान की आंखों से लगातार पानी आ रहा था।

अदालत से यह भी आग्रह किया गया है कि उनके निजी चिकित्सकों या किसी स्वतंत्र विशेषज्ञ को जांच की अनुमति दी जाए।


सुप्रीम कोर्ट का दखल

मामले को गंभीर मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड गठित करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि विस्तृत जांच कर रिपोर्ट पेश की जाए, ताकि स्वास्थ्य संबंधी दावों की पुष्टि की जा सके।


एकांत कारावास पर सवाल

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इमरान खान को लंबे समय से एकांत कारावास में रखा गया है। दावा है कि पिछले कई महीनों से उन्हें वकीलों और परिजनों से नियमित मुलाकात की अनुमति नहीं मिली। वकील का कहना है कि इसका असर उनकी मानसिक स्थिति पर पड़ रहा है।


जेल की स्थितियों पर चिंता

रिपोर्ट में जेल की परिस्थितियों को लेकर भी चिंता जताई गई है। आरोप है कि कोठरी में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं, जिससे स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ी हैं। फूड पॉइजनिंग, गर्मी और मच्छरों की समस्या का भी जिक्र किया गया है। साथ ही निष्पक्ष ट्रायल और अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराने की मांग की गई है।


राजनीतिक और कानूनी असर –

इमरान खान की सेहत को लेकर उठे सवाल पाकिस्तान की राजनीति में नई बहस छेड़ सकते हैं। यदि मेडिकल बोर्ड रिपोर्ट में गंभीर स्वास्थ्य जोखिम की पुष्टि होती है, तो यह न केवल कानूनी प्रक्रिया बल्कि राजनीतिक माहौल को भी प्रभावित कर सकता है।

साथ ही यह मामला जेल सुधार, कैदियों के अधिकार और हाई-प्रोफाइल बंदियों के साथ व्यवहार जैसे मुद्दों को भी चर्चा में ला सकता है। अब निगाहें मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

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