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सादगी की मिसाल: जब आईएएस अफसरों ने दिखावे को नहीं, मूल्यों को चुना, अलवर कलेक्टर चैंबर में रची गई अनोखी शादी ने समाज को दिया बड़ा संदेश

अक्सर शादियों को लेकर हमारे समाज में एक धारणा बन चुकी है — बड़ी बारात, चमक-दमक, बैंड-बाजा, दिखावे की होड़ और लाखों का खर्च। लेकिन जब देश के दो जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी खुद सादगी की मिसाल बन जाएं, तो वह सिर्फ शादी नहीं रहती, बल्कि समाज के लिए एक मजबूत संदेश बन जाती है।

राजस्थान के अलवर में तैनात एसडीएम माधव भारद्वाज और गुजरात के जामनगर में पदस्थ एसडीएम अदिति वासने ने अपनी शादी को एक सामाजिक संदेश में बदल दिया। दोनों आईएएस अधिकारियों ने बिना किसी तामझाम, बिना शोर-शराबे और बिना फिजूलखर्ची के बेहद सादगीपूर्ण तरीके से विवाह कर यह साबित कर दिया कि रिश्तों की मजबूती दिखावे से नहीं, सोच और संस्कारों से बनती है।

कलेक्टर चैंबर बना गवाह, सादगी बनी पहचान

बुधवार को अलवर के मिनी सचिवालय में उस समय एक अलग ही दृश्य देखने को मिला, जब जिला कलेक्टर अर्पिता शुक्ला के चैंबर में दोनों अधिकारियों ने कोर्ट मैरिज की प्रक्रिया पूरी की।
न कोई भव्य मंच, न सजावट का शोर, न सैकड़ों लोगों की भीड़ और न ही पारंपरिक बैंड-बाजा।

सिर्फ परिवार के बेहद करीबी सदस्य मौजूद रहे। दोनों ने एक-दूसरे को माला पहनाई और पूरे सम्मान व गरिमा के साथ जीवन भर साथ निभाने का संकल्प लिया।
यह शादी भले ही छोटी थी, लेकिन इसका संदेश बहुत बड़ा था।

दिखावे के दौर में सादगी का साहस

आज के समय में जब लोग एक दिन की शादी पर सालों की कमाई खर्च कर देते हैं, वहीं इन दोनों अफसरों का यह कदम युवाओं के लिए एक आईना है।
उन्होंने यह दिखा दिया कि:

  • शादी रिश्तों का उत्सव है, खर्चों की प्रतियोगिता नहीं
  • खुशी महंगे इंतजामों से नहीं, सच्चे भावनाओं से मिलती है
  • समाज में बदलाव उपदेश से नहीं, अपने आचरण से आता है
  • इनकी यह सादगी बताती है कि पद बड़ा हो सकता है, लेकिन सोच ज़मीन से जुड़ी होनी चाहिए।

युवाओं के लिए प्रेरणा, समाज के लिए सीख

यह शादी उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सामाजिक दबाव में आकर अनावश्यक खर्च करते हैं या कर्ज लेकर शादी करते हैं।
इस फैसले ने यह सोच मजबूत की कि:

“जीवन की शुरुआत अगर सादगी और समझदारी से हो, तो आगे का सफर भी संतुलन और संस्कारों से भरा होता है।”

इन अफसरों ने अपने कर्तव्य और जिम्मेदारी के साथ यह भी साबित कर दिया कि निजी जीवन में भी मूल्य और अनुशासन उतने ही जरूरी हैं जितने प्रशासनिक सेवा में।

एक शादी नहीं, एक सामाजिक संदेश

यह विवाह सिर्फ दो व्यक्तियों का मिलन नहीं था, बल्कि यह समाज को यह बताने का तरीका था कि
खुशियां मनाने के लिए दिखावा जरूरी नहीं,
और रिश्तों को निभाने के लिए महंगी रस्में नहीं, बल्कि सच्ची समझ जरूरी होती है।

आज जब आम आदमी दिखावे के बोझ तले दब रहा है, ऐसे में इस सादगीपूर्ण विवाह ने उम्मीद की एक नई रोशनी जलाई है।

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