‘कुमार’ लिखकर छिपाई पहचान, पुलिस भर्ती से पहले ही मौत — ‘होमबाउंड’ दिखाती है समाज की कड़वी सच्चाई
क्या समाज में आपकी जाति आपकी पहचान तय करती है? नीरज घेवन की फिल्म ‘होमबाउंड’ इसी सवाल को बेहद संवेदनशील और मार्मिक अंदाज़ में सामने रखती है। गरीबी, बेरोज़गारी और जातिगत असहजता के बीच जूझते युवाओं की यह कहानी आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रही है और दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर रही है।
🌍 1. ऑस्कर में भारत की मौजूदगी
‘होमबाउंड’ इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी में ऑस्कर की दौड़ में शामिल टॉप 15 फिल्मों की सूची में जगह बना चुकी है। यह उपलब्धि न सिर्फ फिल्म की गुणवत्ता को दर्शाती है, बल्कि उसके सामाजिक सरोकारों को भी वैश्विक पहचान दिलाती है।
🎬 2. कहानी का केंद्र: दो दोस्त और एक सपना
फिल्म दो गरीब युवाओं—शोएब और चंदन कुमार वाल्मिकी (ईशान खट्टर और विशाल जेठवा)—की कहानी है। दोनों अपने परिवार को तंगहाली से निकालने के लिए सरकारी नौकरी का सपना देखते हैं। वे फॉर्म भरते हैं, परीक्षा केंद्रों के चक्कर लगाते हैं और फिर शुरू होता है नतीजों का अंतहीन इंतज़ार।
🏷️ 3. जाति की असहज पहचान
कहानी का सबसे संवेदनशील पहलू है चंदन की जातिगत पहचान। वह वाल्मिकी समाज से है, लेकिन इसे बताने में झिझकता है। जब वह सरकारी दफ्तर में रिजल्ट के बारे में पूछता है, तो अपना नाम सिर्फ “चंदन कुमार” बताता है और अपनी कैटेगरी स्वीकार करने से इनकार कर देता है। यह एक छोटा-सा दृश्य समाज की गहरी सच्चाई उजागर कर देता है।
🚉 4. आत्मविश्वास बनाम संकोच
एक दृश्य में रेलवे स्टेशन पर उनकी मुलाकात सुधा भारती (जान्हवी कपूर) से होती है, जो पूरे आत्मविश्वास से अपना नाम और पहचान बताती है। सुधा का यह निडर रवैया चंदन को भीतर तक झकझोर देता है और उसकी असहजता को और स्पष्ट कर देता है।
🏙️ 5. रोजगार की तलाश और शहर से शहर की भटकन
नतीजे में देरी और पैसों की मजबूरी दोनों दोस्तों को घर छोड़ने पर मजबूर करती है। चंदन काम की तलाश में गुजरात चला जाता है। कुछ समय बाद शोएब भी वहीं पहुंच जाता है। दोनों एक बार फिर साथ होते हैं, लेकिन ज़िंदगी की मुश्किलें उनका पीछा नहीं छोड़तीं।
🦠 6. लॉकडाउन और घर वापसी की मजबूरी
फिर आता है कोविड-19 का दौर। देशभर में लॉकडाउन लग जाता है। दूसरे शहर में फंसे दोनों दोस्तों के पास न राशन है, न सहारा। मजबूरी में वे पैदल ही अपने गांव लौटने का फैसला करते हैं। लंबा और थकाने वाला सफर उनकी ताकत छीन लेता है।
💔 7. मंज़िल से पहले ही टूट गया सपना
घर लौटते-लौटते चंदन रास्ते में ही दम तोड़ देता है। कुछ समय बाद उस परीक्षा का परिणाम आता है, जिसमें चंदन का चयन पुलिस भर्ती के लिए हो चुका होता है। जिस नौकरी के लिए उसने संघर्ष किया, वह उसे मिलती है—लेकिन तब, जब वह इसे अपनाने के लिए ज़िंदा नहीं रहता।
📌 8. यह फिल्म क्यों झकझोरती है?
‘होमबाउंड’ सिर्फ दो दोस्तों की कहानी नहीं, बल्कि एक पूरे सिस्टम पर सवाल है।
तीन बड़े मुद्दे सामने आते हैं—
- जातिगत पहचान का बोझ: चंदन का अपनी पहचान छिपाना उस सामाजिक डर को दिखाता है, जो आज भी मौजूद है।
- बेरोज़गारी और सरकारी नौकरी की दौड़: लाखों युवा इसी असुरक्षा में फंसे हैं।
- महामारी का असमान असर: लॉकडाउन ने सबसे ज़्यादा नुकसान उन्हीं लोगों को पहुंचाया, जिनके पास साधन नहीं थे।
🎥 9. ‘होमबाउंड’ का संदेश
फिल्म यह सवाल छोड़ जाती है कि क्या किसी इंसान की काबिलियत उसकी जाति से तय होनी चाहिए? क्या एक युवा को अपनी पहचान छिपाकर आगे बढ़ने पर मजबूर होना चाहिए? ‘होमबाउंड’ इन सवालों का जवाब नहीं देती, लेकिन दर्शक को सोचने के लिए मजबूर जरूर करती है।
‘होमबाउंड’ एक संवेदनशील, सच्ची और झकझोर देने वाली कहानी है, जो समाज के उस पहलू को सामने लाती है, जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। चंदन का संघर्ष, उसकी चुप्पी और अंत में अधूरा रह गया सपना—ये सब मिलकर इस फिल्म को सिर्फ सिनेमा नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज़ बना देते हैं।