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Holi 2026: होलिका दहन की राख क्यों मानी जाती है शुभ? जानें लगाने की विधि और घर में रखने का सही स्थान

रंगों का पर्व होली से पहले होने वाला होलिका दहन सनातन परंपरा में विशेष महत्व रखता है। पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में होलिका दहन 3 मार्च (मंगलवार) को किया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं में होलिका की अग्नि को शुद्धि और नकारात्मकता के नाश का प्रतीक माना गया है। दहन के बाद बची राख (भस्म) को भी कई घरों में शुभ माना जाता है और उससे जुड़े कुछ परंपरागत उपाय प्रचलित हैं।

होलिका दहन 2026: तिथि और धार्मिक संदर्भ

होलिका दहन फाल्गुन मास की पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर किया जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। परंपरा के अनुसार इस दिन सामूहिक रूप से अग्नि प्रज्वलित कर नकारात्मक प्रवृत्तियों के त्याग का संकल्प लिया जाता है।

होलिका की राख माथे पर क्यों लगाई जाती है?

लोक-परंपराओं के अनुसार होलिका दहन की अग्नि में नकारात्मक ऊर्जा के नष्ट होने की मान्यता है। इसी कारण उसकी राख को शुद्ध माना जाता है। मान्यता है कि माथे पर राख लगाने से

  • नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा का भाव मिलता है,
  • मन में सकारात्मकता और आत्मविश्वास बढ़ता है,
  • घर-परिवार में सुख-शांति की भावना बनी रहती है।

नोट: यह आस्थाओं पर आधारित मान्यताएं हैं, जिनका वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक नहीं है।

होलिका की राख घर में कहां और कैसे रखें?
धार्मिक परंपराओं में राख को संभालकर रखने की विधियां बताई जाती हैं। मान्यताओं के अनुसार—

  • राख को साफ डिब्बी या लाल कपड़े में बांधकर घर के पूजा स्थल पर रखा जा सकता है।
  • कुछ लोग इसे धन-संबंधी स्थान (तिजोरी/कैश बॉक्स) के पास रखते हैं, जिसे समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
  • घर के मुख्य द्वार पर बहुत हल्की मात्रा में राख छिड़कने की परंपरा भी कुछ स्थानों पर प्रचलित है।

राख लगाने की पारंपरिक विधि
परंपरा के अनुसार होलिका दहन के बाद अग्नि के शांत होने पर थोड़ी सी राख ली जाती है। अगले दिन स्नान के बाद दाहिने हाथ की अनामिका से माथे पर तिलक के रूप में लगाया जाता है। इस दौरान अपने आराध्य देव का स्मरण करने की परंपरा बताई जाती है।

होलिका दहन का पौराणिक महत्व

होलिका दहन की कथा भक्त प्रह्लाद और उसके पिता हिरण्यकश्यप से जुड़ी है। कथा के अनुसार हिरण्यकश्यप ने भगवान विष्णु की भक्ति करने से रोकने के लिए प्रह्लाद को अग्नि में बैठाया, जहां उसकी बहन होलिका भी थी। मान्यता है कि ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जलकर भस्म हो गई। यह प्रसंग भगवान विष्णु की भक्ति और आस्था की विजय का प्रतीक माना जाता है।

यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और लोक-परंपराओं पर आधारित है। वेबसाइट इन मान्यताओं की वैज्ञानिक या आधिकारिक पुष्टि का दावा नहीं करती। पाठक अपनी आस्था और विवेक के अनुसार निर्णय लें।

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