राजस्थान में एक साथ पंचायत–नगर निकाय चुनाव पर हाईकोर्ट सख्त: 15 अप्रैल 2026 तक मतदान कराने के सख्त आदेश देते हुए, 31 दिसंबर तक परिसीमन पूरा करने के भी निर्देश दिए है…
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ा संदेश देते हुए साफ कहा है कि पंचायत और नगर निकाय चुनाव अब अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ 15 अप्रैल 2026 से पहले हर हाल में कराए जाएं। साथ ही परिसीमन प्रक्रिया 31 दिसंबर 2025 तक पूरी करने का सख्त आदेश दिया है। जयपुर–जोधपुर में लंबित 439 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि परिसीमन प्रक्रिया को भविष्य में चुनौती नहीं दी जा सकेगी, जिससे सरकार की ‘वन स्टेट वन इलेक्शन’ योजना को अप्रत्यक्ष बल मिलता दिख रहा है।
राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ— चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित—ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए कि पंचायत और नगर निकाय चुनाव 15 अप्रैल 2026 से पहले एक साथ कराए जाएं।
कोर्ट ने कहा कि परिसीमन प्रक्रिया 31 दिसंबर तक तीन सदस्यीय राज्य स्तरीय समिति द्वारा पूरी की जानी चाहिए, ताकि चुनावी ढांचा समय पर तैयार हो सके।
यह सुनवाई गिरिराज सिंह देवंदा, संयम लोढ़ा सहित 439 याचिकाओं पर हुई, जिनमें चुनाव टालने, पुनर्गठन, परिसीमन की गड़बड़ियों और सरपंचों–प्रधानों को हटाकर प्रशासक लगाने के फैसलों को चुनौती दी गई थी।
इस पर कोर्ट ने सरकार से पूछा—चुनाव कब तक करा सकते हो? सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद से पूछा कि परिसीमन पूरा करने के बाद चुनाव कराने में कितना समय लगेगा? इस पर एजी ने कहा—“अदालत समय तय कर दे।” जिस पर कोर्ट ने स्पष्ट समयसीमा तय करते हुए कहा—15 अप्रैल 2026 की डेडलाइन से आगे सरकार नहीं जाएगी।
साथ ही कोर्ट ने कहा कि परिसीमन प्रक्रिया को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने सरपंच–प्रधानों को हटाकर प्रशासक लगाने के फैसलों पर दायर याचिकाएं खारिज कर दी ,
इस फैसले ने पंचायत संरचना के पुनर्गठन को लेकर महीनों से चल रही कानूनी जद्दोजहद को एक झटके में समाप्त कर दिया।
राज्य सरकार ने कोर्ट में तर्क दिया कि: परिसीमन पूरी तरह कार्यपालिका का विषय है, अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। प्रदेश में वन स्टेट वन इलेक्शन मॉडल का परीक्षण किया जा रहा है, जिसके लिए उच्च स्तरीय समिति गठित है। कोर्ट की सख्ती के बावजूद सरकार की इस अवधारणा को भी अप्रत्यक्ष रूप से वैधानिक सहमति मिलती दिख रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल: आदेश का पालन कैसे होगा? हाईकोर्ट ने तो डेडलाइन दे दी, लेकिन चुनावी कैलेंडर में कई तकनीकी अड़चनें खड़ी हैं—
फरवरी 2026 तक चलेगा SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण)
राजस्थान में मतदाता सूची का SIR कार्यक्रम फरवरी तक निर्धारित है। मतलब—परिसीमन पूरा होने के बावजूद मतदाता सूची अपडेट नहीं की जा सकती। दूसरा SIR पूरा होने के बाद 2.5 महीने लगेंगे नई मतदाता सूची तैयार करने में ,इसके अलावा मतदाता सूची पुनरीक्षण, आपत्तियां, अंतिम प्रकाशन—यह पूरा चक्र मार्च–अप्रैल तक जाएगा।
फिर नए वार्ड, नई सीमाएं—
यह प्रक्रिया ही मई–जून तक जा सकती है। जनवरी–फरवरी तक कई निकायों और पंचायत राज संस्थाओं का कार्यकाल फिर पूरा होने लगेगा, ऐसे में सभी का एक साथ चुनाव कराना प्रशासनिक चुनौती बनेगा।
यही कारण है—सरकार या SEC कोर्ट में समयवृद्धि की मांग कर सकते हैं। क्योंकि मौजूदा परिस्थितियों में 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव कराना तकनीकी रूप से लगभग असंभव माना जा रहा है।
राजस्थान की 11,000 से ज्यादा ग्राम पंचायतों में सरपंचों का कार्यकाल पूरा होने के बाद से प्रशासक बैठे हैं।
नगर निगमों में यह भूमिका संभागीय आयुक्त निभा रहे हैं।
मतलब साफ है —ग्रामीण और नगरीय दोनों क्षेत्रों में जनता चुनी हुई सरकार से वंचित है, और कोर्ट ने इसी अंतराल को देखते हुए सख्त आदेश दिए हैं।
राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बड़ा उलटफेर करता है।
यह फैसला सरकार की वन स्टेट वन इलेक्शन की योजना को रफ्तार देता है, पर साथ ही चुनावी कार्यक्रम, मतदाता सूची सुधार और परिसीमन जैसे तकनीकी चरणों के कारण सरकार पर भारी दबाव भी बनाता है। अगले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि—क्या सरकार कोर्ट की समयसीमा का पालन करेगी, या समयवृद्धि के लिए दोबारा अदालत का दरवाज़ा खटखटाएगी।