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परिवारवाद पर गहलोत का सख्त संदेश: “राजनीति में आएं, लेकिन सरकार से दूर रहें परिजन”

राजस्थान की राजनीति में परिवारवाद को लेकर चल रही बहस के बीच पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने अपने कार्यकाल का उदाहरण देते हुए बताया कि उनका बेटा वैभव गहलोत कभी मुख्यमंत्री आवास में नहीं रहा, बल्कि किराए के मकान में रहकर सामान्य जीवन जीता था। गहलोत ने कहा कि राजनीति में परिवार के लोगों का आना गलत नहीं, लेकिन सरकारी कामकाज में उनका हस्तक्षेप लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए नुकसानदायक है।

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परिवारवाद पर नई लाइन: राजनीति और सरकार में फर्क जरूरी

अशोक गहलोत ने परिवारवाद के मुद्दे पर अपनी स्थिति साफ करते हुए कहा कि नई पीढ़ी का राजनीति में आना स्वाभाविक और सकारात्मक है। उन्होंने नेताओं को सलाह दी कि वे अपने परिवार के सदस्यों को राजनीति में जरूर लाएं ताकि वे अनुभव हासिल कर सकें। लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राजनीति और सरकार दो अलग चीजें हैं। परिवार के लोगों को सरकारी फैसलों, फाइलों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से दूर रखना बेहद जरूरी है। गहलोत का मानना है कि यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है और इससे पारदर्शिता बनी रहती है।

वैभव गहलोत का उदाहरण: सादगी और अनुशासन की मिसाल

अपने ऊपर लगने वाले परिवारवाद के आरोपों का जवाब देते हुए गहलोत ने निजी उदाहरण पेश किया। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री रहते हुए भी उनका बेटा वैभव गहलोत कभी सीएम आवास में नहीं रहा। वह जयपुर में एक किराए के मकान में रहता था और अपनी जिंदगी सामान्य तरीके से जीता था। गहलोत ने कहा कि यह निर्णय जानबूझकर लिया गया था ताकि सत्ता और निजी जीवन के बीच स्पष्ट दूरी बनी रहे। उनके अनुसार, यह अनुशासन ही राजनीतिक शुचिता और नैतिकता को मजबूत करता है।

चुनाव और पद पर पारदर्शिता: ‘दबाव नहीं, पार्टी का फैसला’

गहलोत ने यह भी स्पष्ट किया कि वैभव गहलोत को राजनीति में मिले अवसर किसी पारिवारिक दबाव का परिणाम नहीं थे। उन्होंने कहा कि जोधपुर से चुनाव लड़ने का निर्णय पूरी तरह पार्टी का था। इसके अलावा राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) से जुड़े मामलों में भी उन्होंने अपने बेटे को कोई विशेष या नियमों से परे लाभ नहीं दिया। गहलोत ने कहा कि किसी भी पद या अवसर का आधार केवल योग्यता और मेहनत होना चाहिए, न कि रिश्तेदारी या राजनीतिक प्रभाव।

निजी हमलों पर नाराजगी: मर्यादा में रहे राजनीति

पूर्व मुख्यमंत्री ने उन नेताओं पर भी नाराजगी जताई जो उनके परिवार को लेकर निजी टिप्पणियां करते हैं। उन्होंने कहा कि राजनीति में आलोचना स्वीकार्य है, लेकिन व्यक्तिगत हमले उचित नहीं हैं। गहलोत ने नेताओं को सलाह दी कि वे सोच-समझकर बयान दें और राजनीतिक मर्यादा का पालन करें। उनका कहना था कि परिवार को बेवजह विवादों में घसीटना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है और इससे राजनीतिक संवाद का स्तर गिरता है।

राजस्थान की राजनीति में नया विमर्श

गहलोत के इस बयान ने राज्य की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। अक्सर यह आरोप लगते रहे हैं कि कई मंत्रियों के परिजन सरकारी कामकाज में दखल देते हैं और समानांतर शक्ति केंद्र बन जाते हैं। ऐसे माहौल में गहलोत का यह बयान एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा रहा है। उनका ‘किराए के मकान’ वाला उदाहरण मौजूदा नेताओं के लिए एक नैतिक कसौटी बन सकता है और भविष्य में राजनीतिक आचरण पर इसका असर भी देखने को मिल सकता है।

‘आउट ऑफ टर्म’ लाभ के खिलाफ स्पष्ट रुख

गहलोत ने साफ कहा कि वे किसी भी ऐसे लाभ के खिलाफ हैं जो बिना योग्यता के केवल रिश्तेदारी के आधार पर दिया जाता है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे राजनीति में आएं, संघर्ष करें और अपनी पहचान खुद बनाएं। उनका मानना है कि सीधे सत्ता में पहुंचने की बजाय मेहनत के जरिए आगे बढ़ना ही सही रास्ता है। यह संदेश न केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं बल्कि आम युवाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकता है।

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