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नाहरगढ़ में क्रूरता की शिकार मादा लेपर्ड — भीड़ की पिटाई के बाद जंगल में मृत मिली…

जयपुर के नाहरगढ़ जंगल से सटे इलाके में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। एक मादा लेपर्ड, जो गलती से आबादी के बीच आ गई थी, उसे लोगों ने बुरी तरह पीटा और कुछ ही घंटों बाद वह मृत अवस्था में मिली। यह घटना मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीरता को उजागर करती है और यह सवाल उठाती है कि आखिर वन्यजीवों की सुरक्षा कब तक भीड़ के हाथों कुचली जाती रहेगी?

घर में घुसी लेपर्ड, भीड़ का आतंक शुरू

नाहरगढ़ से निकली करीब डेढ़ साल की मादा लेपर्ड एक रिहायशी घर में घुस गई। जैसे ही लोगों को इसकी जानकारी मिली, बड़ी संख्या में आसपास के युवक और ग्रामीण वहां जमा हो गए। डर और अफरातफरी का माहौल ऐसा बना कि भीड़ ने उसे भागने देने के बजाय चारों ओर से घेर लिया।

डंडों से बेरहमी से पिटाई की गई

घटना के दौरान कई लोगों ने लाठियों, डंडों और काठ से लेपर्ड को बुरी तरह मारा। कुछ लोगों ने उस पर कंबल डालकर उसे काबू करने की कोशिश की और कई युवक उसके ऊपर बैठ तक गए। मारपीट की आवाजें और अफरा-तफरी का माहौल वहां मौजूद लोगों के मोबाइल कैमरों में भी रिकॉर्ड हुआ।

वन विभाग पहुंचा, पर लेपर्ड की जान बच नहीं सकी

सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और भीड़ को हटाकर किसी तरह लेपर्ड को छुड़वाया। घायल लेपर्ड वहां से भागकर जंगल की ओर तो लौट गई, लेकिन उसकी हालत बेहद खराब थी। अगले दिन नाहरगढ़ के जंगल में वह मृत पाई गई।

पोस्टमॉर्टम में चोटों की पुष्टि — मौत का कारण बना इंसानी हमला

प्रारंभिक जांच में साफ हुआ कि लेपर्ड को शरीर पर गंभीर चोटें आई थीं, जो उसकी मौत की प्रमुख वजह बनीं। वन विभाग ने इसे मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरनाक उदाहरण बताया।

सवालों के घेरे में पुलिस और प्रशासन — वीडियो में दिख रहे लोग अब तक गिरफ्तार नहीं

विडंबना यह है कि मारपीट के दौरान कई लोगों के चेहरे वीडियो में साफ दिखते हैं, फिर भी पहचान बताने या गिरफ्तारी की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। वन विभाग ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला जरूर दर्ज किया है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि “अज्ञात” का ठप्पा लगाकर जांच को कमजोर किया जा रहा है।

अतिक्रमण और विकास ने बढ़ाया संघर्ष

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, नाहरगढ़ के आसपास लगातार बढ़ती बस्तियां और अतिक्रमण तेंदुए, लकड़बग्घे और अन्य जंगली जीवों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर आने पर मजबूर कर रहे हैं।
ऐसे में मानव-वन्यजीव टकराव बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन इसका खामियाज़ा जानवरों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ रहा है।

क्या है समाधान? जागरूकता, बफर ज़ोन और सख्त कार्रवाई ज़रूरी

जब तक इंसानी व्यवहार में बदलाव नहीं आएगा, नाहरगढ़ जैसी जगहों पर यह संघर्ष और मौतें बढ़ती ही जाएंगी।

नाहरगढ़ की मादा लेपर्ड की मौत — एक चेतावनी कि जंगली जानवरों से ज़्यादा खतरनाक भीड़ है

यह घटना सिर्फ एक तेंदुए की मौत नहीं, बल्कि यह चेतावनी है कि तेजी से फैलते शहरों और जंगलों के बीच की यह खाई अब जीवन और मौत का फासला बनती जा रही है। वन्यजीव तब तक सुरक्षित नहीं होंगे, जब तक इंसानी भीड़ जिम्मेदारी नहीं सीखेगी।

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