दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिक्योरिटी चेक भी हो सकती है…
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि कोई चेक सिक्योरिटी (सुरक्षा) के रूप में दिया गया हो, लेकिन बाद में वह किसी वैध और कानूनी देनदारी में बदल जाता है, तो वह चेक Negotiable Instruments Act की धारा 138 के तहत मान्य माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी केवल यह कहकर मुकदमे से नहीं बच सकता कि चेक “सिक्योरिटी के लिए” था, अगर बाद में उस पर भुगतान की कानूनी जिम्मेदारी बन चुकी हो।
मामला तब सामने आया जब एक कंपनी के निदेशक ने आपराधिक शिकायत रद्द करने के लिए CrPC की धारा 482 के तहत याचिका दायर की। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि कंपनी द्वारा जारी किया गया चेक बाउंस हो गया, जिसके चलते उन्होंने Negotiable Instruments Act की धारा 138 व 141 के तहत कानूनी कार्रवाई की।
हाईकोर्ट का निर्णय
न्यायालय ने माना कि यदि प्रारंभ में दिया गया सिक्योरिटी चेक बाद में किसी वास्तविक देनदारी से जुड़ जाता है, तो वह “लीगली एनफोर्सेबल डेट” माना जाएगा और धारा 138 लागू होगी। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी केवल “सिक्योरिटी चेक” का हवाला देकर देनदारी से मुक्त नहीं हो सकता।
कानूनी प्रभाव
यह फैसला व्यवसायिक और वित्तीय विवादों में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय कॉर्पोरेट लेनदेन और अनुबंधों में पारदर्शिता व जवाबदेही को मजबूत करेगा।
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में उन सभी मामलों के लिए उदाहरण बनेगा, जहाँ आरोपी “सिक्योरिटी चेक” के नाम पर कानूनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि देनदारी साबित होने पर ऐसा चेक धारा 138 के तहत दंडनीय अपराध का आधार बन सकता है।