दौसा में सिलिकोसिस फर्जीवाड़े का बड़ा खुलासा: दो डॉक्टर और एक रेडियोग्राफर गिरफ्तार, जांच में बड़े नेटवर्क के संकेत
राजस्थान के दौसा जिले में सिलिकोसिस जैसी गंभीर बीमारी के नाम पर चल रहे बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। साइबर थाना पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दो डॉक्टरों और एक रेडियोग्राफर को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि ये लोग फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट बनाकर सरकारी योजनाओं का गलत लाभ दिला रहे थे। प्रारंभिक जांच में संगठित गिरोह के संकेत मिले हैं, जिससे यह मामला और भी गंभीर हो गया है।
फर्जी सर्टिफिकेट बनाकर सरकारी योजनाओं में घोटाला
दौसा में सामने आए इस मामले ने स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस जांच में सामने आया है कि आरोपी सिलिकोसिस जैसी जानलेवा बीमारी के फर्जी प्रमाण पत्र तैयार कर रहे थे। इन सर्टिफिकेट के आधार पर पात्रता न रखने वाले लोगों को सरकारी सहायता राशि दिलाई जा रही थी। यह न केवल सरकारी धन का दुरुपयोग है, बल्कि असली पीड़ितों के अधिकारों का भी हनन है। इस फर्जीवाड़े के जरिए बड़ी संख्या में लोगों को अनुचित लाभ पहुंचाने की आशंका जताई जा रही है।
दो डॉक्टर और एक रेडियोग्राफर गिरफ्त में
साइबर थाना पुलिस ने इस मामले में डॉ. मनोज ऊंचवाल, डॉ. देवी नारायण शर्मा और रेडियोग्राफर मनोहर लाल यादव को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, तीनों आरोपी मिलकर योजनाबद्ध तरीके से फर्जी मेडिकल दस्तावेज तैयार करते थे। इन दस्तावेजों के जरिए ऐसे लोगों के नाम पर भी सिलिकोसिस कार्ड बनाए गए, जो वास्तव में इस बीमारी से पीड़ित नहीं थे। गिरफ्तारी के बाद तीनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
पुराने केस की जांच में खुला बड़ा नेटवर्क
यह मामला वर्ष 2024 में कोतवाली थाने में दर्ज एक प्रकरण से जुड़ा हुआ है। साइबर सेल द्वारा गहराई से की गई जांच में यह फर्जीवाड़ा सामने आया। जांच के दौरान यह भी संकेत मिले हैं कि यह कोई छोटा मामला नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इस गिरोह से जुड़े अन्य लोग कौन हैं और यह नेटवर्क कितने समय से सक्रिय था। आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियों की संभावना जताई जा रही है।
सिलिकोसिस बीमारी के नाम पर गंभीर अपराध
सिलिकोसिस एक खतरनाक फेफड़ों की बीमारी है, जो आमतौर पर खदानों और धूल भरे वातावरण में काम करने वाले मजदूरों को होती है। सरकार ऐसे मरीजों को आर्थिक सहायता और अन्य सुविधाएं प्रदान करती है। ऐसे में इस बीमारी के नाम पर फर्जीवाड़ा करना न केवल कानूनन अपराध है, बल्कि मानवता के खिलाफ भी है। इस तरह की धोखाधड़ी से असली मरीजों को मिलने वाली मदद प्रभावित होती है और सरकारी व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता है।
पुलिस जांच जारी, और खुलासों की संभावना
मामले की जांच कर रहे साइबर सेल के डिप्टी एसपी बृजेश मीणा के अनुसार, शुरुआती जांच में फर्जी प्रमाण पत्र बनाए जाने की पुष्टि हो चुकी है। अब पुलिस इस पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही है। यह पता लगाया जा रहा है कि इस घोटाले में और कौन-कौन शामिल है तथा कितने लोगों को अवैध लाभ पहुंचाया गया। पुलिस का मानना है कि जांच आगे बढ़ने के साथ इस मामले में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं।