“दादरी लिंचिंग केस: यूपी सरकार ने 2015 के अखलाक हत्या मामले के सभी आरोप वापस लेने की अर्जी दायर की”
दादरी लिंचिंग केस में एक नाटकीय मोड़। 2015 में मोहम्मद अखलाक की भीड़ द्वारा की गई हत्या के आरोपियों के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार ने मुकदमा वापस लेने की याचिका दाखिल की है। यह कदम एक दशक बाद उठा गया है, और इससे न्याय, राजनीति और सामाजिक समरसता के सवाल फिर से छिड़ गए हैं। आइए पूरी कहानी, वजहें और इसके संभावित नतीजों को केस स्टडी की शक्ल में समझते हैं।
यह घटना 28 सितंबर 2015 की रात की है जब दादरी के बिसाहड़ा गाँव में भीड़ ने मोहम्मद अखलाक और उनके बेटे दानिश पर हमला किया।
भीड़ का आरोप था कि उन्होंने गाय मारी है और उसके मांस को फ्रिज में रखा है।
अखलाक गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उसकी मौत हो गई; दानिश बच गया, लेकिन ज़ख़्मी था।
कई व्यक्तियों पर विभिन्न आईपीसी (IPC) धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए थे — हत्या (IPC 302), हत्या का प्रयास (307), दंगा (147, 148), घर में घुसने (458), अपमान (504) आदि धाराओं में मामला दर्ज किया गया ।
अब करीब 9 साल बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने मुकदमा वापस लेने के लिए Section 321 CrPC के तहत याचिका दायर की है। जिसमें कहा गया है अखलाक के परिवार द्वारा अभियुक्तों के नाम बताने में “बदलते बयान” दिए गए हैं।
साथ ही यह तर्क दिया गया है कि अभियुक्तों के पास कोई आग्नेयास्त्र (firearms) या तेज़ हथियार नहीं मिला — सिर्फ स्टिक, रॉड, ईंटें मिलें।
सरकार ने अभियोग वापस लेने की मांग करते हुए कहा गया है कि ऐसा “समाज में शांति और सामाजिक समरसता (communal harmony)” बनाए रखने के लिए किया जाना चाहिए।
अर्जी में संविधान के बराबरी के अधिकार (right to equality) का जिक्र भी है — यह तर्क कि अभियुक्तों को भी निष्पक्ष व्यवहार मिलना चाहिए।
अर्जी 15 अक्टूबर 2025 को सुरजपुर कोर्ट (Upper Sessions Court, गौतम बुद्ध नगर) में दाखिल की गई थी।
अब सुनवाई की अगली तारीख 12 दिसंबर 2025 को तय की गई है।
यदि कोर्ट इस अर्जी को स्वीकार करता है, तो मुकदमा वापस लिया जा सकता है और आरोपी कानूनी दायरों (चार्जेज) से बरी हो सकते हैं। सरकार के इस निर्णय पर प्रतिक्रियाएँ और विवाद भी सामने आ रहे है ।
अखलाक का परिवार के वकील यूसुफ सैफी ने बताया कि वे आधिकारिक दस्तावेज अभी पूरी तरह से नहीं देख पाए हैं और कोर्ट के फैसले के बाद अगला कदम तय करेंगे।
वही AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस फैसले की तीखी आलोचना की है। उन्होंने कहा है,“अन्याय की बुनियाद पर समरसता मुमकिन नहीं … दोषियों को बख्शा जाना सामाजिक विसंगति को बढ़ाता है।”
यह मामला लगभग 10 साल बाद फिर से ज़िंदा हुआ है — लंबी अवधि में आरोपी और पीड़ित दोनों ही राजनीतिक व सामाजिक दबावों के अधीन हो सकते हैं। सरकार का तर्क है कि “समरसता बनाए रखना” ज़रूरी है, लेकिन यह सवाल उठता है — क्या साम्प्रदायिक हिंसा में मारे गए व्यक्ति के परिवार को न्याय और हिसाब माँगने का अधिकार नहीं है? यदि ऐसा फैसला मंजूर हुआ, तो यह एक उदाहरण बन सकता है कि सरकारें संवेदनशील मामलों में अभियोजन वापस ले सकती हैं—जिससे कानूनी प्रणाली में विश्वास प्रभावित हो सकता है।
उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला दादरी लिंचिंग केस में एक बड़ा मोड़ है — न सिर्फ कानूनी बल्कि राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी। यह न केवल न्याय की मांग करने वाले परिवार के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए यह सवाल खड़ा करता है कि समरसता और न्याय में संतुलन कैसे बनाया जाए। यदि कोर्ट मुकदमा वापस लेने की अनुमति देता है, तो यह पिछले विवादों की पुनरजागरूकता के साथ-साथ भविष्य की समान घटनाओं पर भी गहरा असर डाल सकता है।