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तिब्बत की पहचान पर प्रहार: धार्मिक प्रतीक मिटाने से प्रार्थना ध्वज जलाने तक चीन का अभियान


तिब्बत में सांस्कृतिक और धार्मिक दमन को लेकर एक बार फिर गंभीर आरोप सामने आए हैं। श्रीलंका के प्रमुख मीडिया संस्थान सीलोन वायर न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) तिब्बती पहचान को कमजोर करने के लिए सुनियोजित तरीके से भाषा, धर्म और परंपराओं को निशाना बना रही है। ताज़ा घटनाएं बताती हैं कि यह दमन अब प्रतीकात्मक स्तर से आगे बढ़कर खुली कार्रवाई में बदल चुका है।


🟠 धार्मिक प्रतीकों की जगह चीनी राष्ट्रवाद

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि तिब्बत की पहाड़ियों पर पत्थरों में उकेरे गए पवित्र बौद्ध मंत्र ‘ओम मणि पद्मे हम’ को हटाकर वहां चीनी राष्ट्रीय ध्वज लगाया गया है। सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए इस बदलाव की पुष्टि की गई है। इसे तिब्बती आस्था को दबाने और चीनी राष्ट्रवादी पहचान थोपने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।


🟠 खानाबदोशों पर दबाव, प्रार्थना ध्वज हटाने की मजबूरी

तिब्बती खानाबदोश समुदायों को पारंपरिक मणि प्रार्थना ध्वज हटाने के लिए मजबूर किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, इन ध्वजों की जगह चीनी झंडे लगाने के निर्देश दिए गए। इसके साथ ही स्थानीय लोगों को राजनीतिक ‘री-एजुकेशन’ यानी वैचारिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए बाध्य किया गया।


🟠 आग का बहाना, आस्था को जलाने का आरोप

सीलोन वायर न्यूज की रिपोर्ट में बताया गया है कि हाल के महीनों में चीनी अधिकारियों ने आग लगने के खतरे का हवाला देकर पारंपरिक तिब्बती प्रार्थना ध्वजों को जला दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कदम सुरक्षा से ज्यादा तिब्बती धार्मिक परंपराओं को खत्म करने की नीति का हिस्सा है।


🟠 प्रार्थना चक्र और ध्वज तोड़े गए

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में कई इलाकों में मणि प्रार्थना ध्वज और प्रार्थना चक्रों को हटाया गया या तोड़ दिया गया। इन कार्रवाइयों के पीछे कोई ठोस कानूनी या तकनीकी कारण नहीं बताया गया, जिससे दमन के आरोप और गहरे हो गए हैं।


🟠 दलाई लामा के जन्मदिन पर कड़ी पाबंदियां

जब तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा का 90वां जन्मदिन मनाया जा रहा था, उसी दौरान तिब्बत में धार्मिक गतिविधियों और लोगों की आवाजाही पर सख्त प्रतिबंध लगाए गए। इसे बीजिंग की ओर से तिब्बती एकजुटता को तोड़ने की कोशिश के रूप में देखा गया।


🟠 री-एजुकेशन से इनकार पर सज़ा

रिपोर्ट में कहा गया है कि जो लोग चीन के तथाकथित री-एजुकेशन प्रोग्राम में शामिल होने से इनकार करते हैं, उन्हें झूठे मामलों में हिरासत, लंबी कैद और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। यह दबाव तिब्बती समाज की संरचना को कमजोर कर रहा है।


🟠 विशेषज्ञों की राय: ‘डिज़्नीफिकेशन’ की कोशिश

इटली के धर्म समाजशास्त्री मास्सिमो इंट्रोविग्ने ने इन घटनाओं को पवित्रता का खुला अपमान बताया। उनके अनुसार, CCP तिब्बती धर्म और संस्कृति को खत्म कर उसकी जगह पर्यटकों के लिए बनाई गई एक कृत्रिम और सतही छवि छोड़ना चाहती है। उनका कहना है कि यह प्रक्रिया दशकों से जारी है, लेकिन राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कार्यकाल में इसमें तेजी आई है।


🟠 खाम प्रांत में 300 बौद्ध स्तूप ध्वस्त

रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 के मध्य में तिब्बत के खाम प्रांत में करीब 300 बौद्ध स्तूपों को तोड़ दिया गया। सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन (CTA) ने इसे सांस्कृतिक तोड़फोड़ का खुला उदाहरण बताया है, जिसने दुनियाभर के तिब्बतियों को आहत किया है।


🟠 ‘नियमों’ का बहाना, आस्था का सफाया

CTA का कहना है कि चीनी अधिकारी इन ध्वंस कार्रवाइयों को सरकारी जमीन और नियमों के उल्लंघन का हवाला देकर सही ठहराते हैं। लेकिन स्तूपों का मलबा पूरी तरह हटाया जाना इस बात का संकेत है कि सदियों पुरानी धार्मिक पहचान को मिटाने की कोशिश की जा रही है।


तिब्बत में धार्मिक प्रतीकों को हटाने, प्रार्थना ध्वज जलाने और स्तूप तोड़ने की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि चीन का लक्ष्य केवल प्रशासनिक नियंत्रण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्लेखन है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन आरोपों से चीन की छवि पर असर पड़ सकता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि तिब्बती समाज पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।

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