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अफ्रीका में चीन की समुद्री रणनीति: 32 देशों में बंदरगाह नेटवर्क, हिंद महासागर में भारत की बढ़ी चिंताबीजिंग की नई नौसैनिक चाल

चीन तेजी से अपनी नौसैनिक ताकत का विस्तार कर रहा है और इसके लिए अफ्रीका को रणनीतिक केंद्र के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। बीते एक दशक में चीन ने अफ्रीका के 32 देशों में बंदरगाहों का एक व्यापक नेटवर्क खड़ा किया है, जिन्हें चीनी सरकारी कंपनियां संचालित कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये बंदरगाह केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सैन्य उपयोग के लिए भी तैयार किए गए हैं।

व्यापार से आगे सैन्य तैयारी

अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार, अफ्रीका में बने कई चीनी बंदरगाह इतने गहरे और आधुनिक हैं कि वहां युद्धपोत, पनडुब्बियां और बड़े सैन्य जहाज आसानी से ठहर सकते हैं। इन बंदरगाहों का स्थान ऐसे समुद्री मार्गों के पास है, जो वैश्विक व्यापार के लिए बेहद अहम माने जाते हैं, जैसे स्वेज नहर और हिंद महासागर के प्रमुख रूट।

चीनी कंपनियों के हाथ में संचालन

एक अमेरिकी रक्षा थिंक टैंक के मुताबिक, चीनी सरकारी कंपनियां अफ्रीका के 78 बंदरगाहों में निर्माणकर्ता, निवेशक या ऑपरेटर की भूमिका निभा रही हैं। नाइजीरिया का लेक्की पोर्ट, केन्या का मोम्बासा और अन्य बड़े बंदरगाह इस नेटवर्क का हिस्सा हैं। इन परियोजनाओं में अरबों डॉलर का निवेश किया गया है, जिससे चीन की लॉन्ग-टर्म रणनीति साफ नजर आती है।

कच्चे संसाधनों तक सीधी पहुंच

अफ्रीका में मौजूद ये बंदरगाह चीन को तांबा, कोबाल्ट और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों तक आसान पहुंच देते हैं। ये संसाधन आधुनिक तकनीक, रक्षा उपकरण और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग के लिए बेहद जरूरी हैं। कई बंदरगाह सीधे रेल और सड़क नेटवर्क के जरिए खदानों से जुड़े हुए हैं, जिससे चीन की आपूर्ति श्रृंखला और मजबूत होती है।

वैश्विक शिपिंग पर नजर रखने की क्षमता

सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इन बंदरगाहों के जरिए चीन समुद्र से गुजरने वाले संवेदनशील कार्गो और रणनीतिक सामान पर निगरानी रख सकता है। जरूरत पड़ने पर यह नेटवर्क नौवहन को प्रभावित करने या दबाव बनाने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

अमेरिकी नीति से चीन को मिला अवसर

अमेरिका की आक्रामक विदेश नीति और रणनीतिक दबावों के बीच चीन ने अफ्रीका में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का मौका पाया है। अमेरिका द्वारा तेल टैंकरों की जब्ती और रणनीतिक क्षेत्रों पर सख्त रुख ने कई देशों को वैकल्पिक साझेदार की तलाश में धकेला, जिसका लाभ चीन को मिला।

हिंद महासागर में भारत के लिए चुनौती

चीन पहले से ही जिबूती में अपने नौसैनिक अड्डे का संचालन कर रहा है। इसके अलावा चीनी युद्धपोत, जासूसी जहाज और पनडुब्बियां अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में नियमित रूप से देखी जा रही हैं। अफ्रीका में बने बंदरगाहों के कारण चीन की हिंद महासागर में स्थायी मौजूदगी की क्षमता और बढ़ गई है, जिससे भारत की समुद्री सुरक्षा चिंताओं में इजाफा हुआ है।

‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति का विस्तार

विशेषज्ञ इसे चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति का अगला चरण मानते हैं, जिसके तहत वह भारत के चारों ओर समुद्री ठिकानों का नेटवर्क तैयार कर रहा है। अफ्रीका से लेकर दक्षिण एशिया तक फैली यह रणनीति आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

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