शंकराचार्य विवाद और नोएडा हादसे के बाद यूपी में अलर्ट मोड में बीजेपी, पंचायत चुनाव से पहले बढ़ी सतर्कता
उत्तर प्रदेश में बीते एक हफ्ते के भीतर सामने आई दो संवेदनशील घटनाओं—प्रयागराज में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ा विवाद और नोएडा में इंजीनियर युवराज की दर्दनाक मौत—ने सियासी और प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। पंचायत चुनावों से पहले बीजेपी किसी भी तरह का नकारात्मक संदेश जाने से रोकने के लिए अब बेहद सावधानी से कदम बढ़ा रही है।
प्रयागराज माघ मेले की घटना ने खड़े किए सवाल
प्रयागराज माघ मेले के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के स्नान को लेकर हुई प्रशासनिक कार्रवाई ने प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया। प्रशासन का तर्क है कि संभावित भगदड़ और अव्यवस्था से बचने के लिए यह कदम जरूरी था, लेकिन इस कार्रवाई को लेकर संत समाज और विपक्षी दलों में नाराजगी देखी गई।
सरकार के भीतर दिखे अलग-अलग सुर
इस पूरे घटनाक्रम पर सरकार के भीतर भी एकरूपता नजर नहीं आई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम लिए सनातन पर प्रहार करने वालों के खिलाफ कड़ा संदेश दिया, जबकि उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की बात कही।
विपक्ष ने साधा राजनीतिक निशाना
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस खुलकर सामने आ गई हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने माघ मेले में पहुंचकर धरने को समर्थन दिया, वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने बीजेपी पर सनातन पर आघात करने का आरोप लगाते हुए सरकार को कटघरे में खड़ा किया।
नोएडा इंजीनियर की मौत से प्रशासन पर सवाल
दूसरी ओर, नोएडा सेक्टर-150 में बेसमेंट में भरे पानी में इंजीनियर युवराज की मौत ने प्रशासनिक संवेदनशीलता और आपदा प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। दमकल, पुलिस और एसडीआरएफ की मौजूदगी के बावजूद युवक को नहीं बचा पाने से शहरी सुरक्षा व्यवस्था की खामियां उजागर हुईं।
सरकार की त्वरित कार्रवाई, लेकिन असंतोष बरकरार
नोएडा मामले में सरकार ने एसआईटी गठित की, संबंधित बिल्डर के खिलाफ कार्रवाई शुरू की और नोएडा प्राधिकरण के सीईओ को हटाया गया। इसके बावजूद यह सवाल बना हुआ है कि जब पहले भी इसी इलाके में ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, तो ठोस निवारक कदम क्यों नहीं उठाए गए।
चुनावी साल में बीजेपी की रणनीतिक चुनौती
बीजेपी नेताओं का मानना है कि इन दोनों मामलों को बेहद संतुलन और संवेदनशीलता के साथ संभालना जरूरी है। पार्टी नहीं चाहती कि सरकार और समाज के किसी वर्ग के बीच टकराव का संदेश जाए, खासकर तब जब मई-जून में पंचायत चुनाव और अगले साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं।
फूंक-फूंक कर कदम रखने की मजबूरी
शंकराचार्य विवाद और नोएडा हादसे ने यह साफ कर दिया है कि छोटे प्रशासनिक फैसले भी बड़े राजनीतिक मुद्दे बन सकते हैं। ऐसे में बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह कानून-व्यवस्था, आस्था और नागरिक सुरक्षा—तीनों के बीच संतुलन बनाते हुए विपक्ष को आक्रामक होने का अवसर न दे।