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बिहार चुनाव 2025: लालू यादव की एक रणनीतिक चूक ने RJD की पकड़ ढीली की, NDA की ऐतिहासिक बढ़त…

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का परिणाम राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा संदेश छोड़ गया है। 243 सीटों वाले राज्य में एनडीए ने 202 सीटों पर रिकॉर्ड जीत दर्ज की, जबकि मुख्य विपक्षी दल RJD महज़ 25 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर सिमट गई। राजनीतिक पंडितों के अनुसार, लालू प्रसाद यादव की एक बड़ी रणनीतिक भूल इस भारी पराजय की प्रमुख वजह मानी जा रही है। नीचे पढ़िए विस्तृत विश्लेषण, नई सुर्खियों और हर पैरा की अलग हेडलाइन के साथ।

NDA की प्रचंड जीत: बिहार में नया राजनीतिक समीकरण

बिहार में इस बार एनडीए ने ऐसा आंकड़ा छुआ, जिसकी उम्मीद खुद सत्ता पक्ष को भी नहीं थी। 202 सीटों की जीत ने यह साफ कर दिया कि जनता ने नेतृत्व, विकास और स्थिरता के नाम पर बड़े पैमाने पर मतदान किया। यह परिणाम बिहार की राजनीति में एक नए पावर बैलेंस की शुरुआत है।

RJD का प्रदर्शन ऐतिहासिक रूप से कमजोर क्यों रहा?

143 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद RJD महज 25 सीटें ही जीत सकी। पार्टी की उम्मीदें जमीन पर नहीं उतर सकीं। युवाओं, महिलाओं और ग्रामीण मतदाताओं की जिस पकड़ पर RJD निर्भर थी, वह खिसकती नजर आई। सोशल इंजीनियरिंग की पारंपरिक रणनीति इस बार असर नहीं दिखा सकी।

लालू यादव की ‘वो एक गलती’ जिसने पलट दिया खेल

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि RJD की सबसे बड़ी चूक टिकट वितरण और गठबंधन प्रबंधन में हुई। लालू यादव द्वारा कुछ अहम सीटों पर पुराने समीकरणों को तरजीह देने और ग्राउंड रिपोर्ट को नजरअंदाज करने से कई मजबूत उम्मीदवार टिकट से बाहर हो गए। इस निर्णय का सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ा।

युवा नेतृत्व बनाम पुरानी राजनीति: जनता किस ओर गई?

चुनाव में युवाओं का रुझान आधुनिक, ठोस मुद्दों और विकास की राजनीति की ओर देखा गया। जबकि RJD अपने पुराने जनाधार और पारंपरिक संवाद शैली से बाहर निकलने में देर करती दिखाई दी। इसका फायदा सीधे तौर पर एनडीए को मिला, जिसने युवाओं को रोजगार, निवेश और टेक्नोलॉजी आधारित वादों से जोड़कर बड़ी बढ़त प्राप्त की।

ग्राउंड कैम्पेन में RJD की कमजोरी उजागर

इस चुनाव में बूथ-लेवल प्रबंधन, डिजिटल कैंपेन और सोशल मीडिया ने निर्णायक भूमिका निभाई। जहां एनडीए का संगठन चुनाव के हर स्तर पर सक्रिय रहा, वहीं RJD का कैम्पेन बिखरा हुआ नज़र आया। स्थानीय मुद्दों को समय रहते उठाने में भी पार्टी पीछे रह गई।

वोट ट्रांसफर में नाकामी: गठबंधन भी नहीं दे पाया सहारा

सहयोगी दलों से RJD को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। कई सीटों पर विपक्षी वोट एकजुट नहीं हुए और एनडीए को सीधा लाभ मिला। उम्मीदवार चयन में असंतुष्टि और स्थानीय स्तर पर मतभेद गठबंधन को कमजोर करते रहे।

आगे का रास्ता: RJD के लिए क्या है विकल्प?

इतिहास की इस बड़ी हार के बाद RJD को नेतृत्व, रणनीति और संगठन—तीनों स्तरों पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है। यदि पार्टी युवा चेहरों को आगे लाकर आधुनिक राजनीतिक रणनीतियों पर फोकस करे तो वापसी की संभावनाएं बनी रह सकती हैं।

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