सबसे बड़ा संगठन, सबसे बड़े चेहरे… फिर भी अंता में क्यों फिसली भाजपा ?
उपचुनाव की हार ने खोला भीतर का घाव—अति आत्मविश्वास, अंतर्कलह और मैदान से गायब दिग्गज नेता
राजस्थान के अंता विधानसभा के उपचुनाव में मिली करारी शिकस्त ने भाजपा के भीतर कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा संगठन, सबसे मजबूत नेटवर्क, और वसुंधरा राजे जैसे करिश्माई चेहरे… फिर भी पार्टी क्यों हार गई? जवाब अंता के मतदान आंकड़ों और नेताओं के व्यवहार में छिपा है—जहां अति आत्मविश्वास, आंतरिक कड़वाहट और भितरघात ने पार्टी को पीछे धकेल दिया देखिए यह रिपोर्ट…
भाजपा हार के बाद भले ही आत्ममंथन और बदलाव की बातें कर रही हो, लेकिन अंता का संदेश साफ है—राजस्थान में भाजपा अपने ही बड़े चेहरों की महत्वाकांक्षाओं के जाल में उलझ चुकी है। सुधार की जगह अब आरोप-प्रत्यारोप और कमजोर दलीलों का खेल चल रहा है। इस पर वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मी प्रसाद पंत लिखते है —
“हार का सबसे बड़ा संकेत यह है कि जिन नेताओं को अंता में होना चाहिए था, वे वहां दिखे ही नहीं।”मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा तो आखिरी समय में रोड शो कर पाए, लेकिन डॉ. किरोड़ी मीणा जैसे प्रभावी नेता, जिनका अंता में निर्णायक वोट बैंक है, मैदान में पहुंचे ही नहीं। दो पूर्व प्रदेश अध्यक्ष—सीपी जोशी और सतीश पूनिया, और राजेन्द्र राठौड़ जैसे अनुभवी नेताओं ने भी दूरी बनाए रखी। नतीजा—अंता में पार्टी की पकड़ फिसल गई।
इसके उलट कांग्रेस ने पूरा दमखम झोंका। गोविंद सिंह डोटासरा ग्राउंड से कैंपेन की कमान संभाले रहे। अशोक गहलोत, टीकाराम जूली और सचिन पायलट गांव-गांव घूमे। यही संगठनात्मक एकजुटता कांग्रेस को जीत का हौसला दे गई, जो पिछले उपचुनावों से लगातार फिसलती जा रही थी।
निर्दलीय नरेश मीणा भी इस चुनाव के सबसे दिलचस्प चेहरा बनकर उभरे। मीणा का युवाओं को आक्रामक तरीके से जोड़ना यह भी कम रोचक नहीं रहा , देवली-उनियारा उपचुनाव में ‘थप्पड़ कांड’ के बाद नरेश को भाजपा ने ही बड़ा नेता बनाया, लेकिन अंता में वही पार्टी के लिए चुनौती बन गए।
अंता की हार सिर्फ भाजपा की नहीं—यह मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे—दोनों के लिए एक बड़ा संकेत है। भजनलाल इसलिए कि वे सरकार के मुखिया हैं, और राजे इसलिए कि हाड़ौती में वो ही पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं।
राजे जानती थीं कि अंता उनका गढ़ है—इसीलिए उन्होंने अयोग्य पूर्व विधायक कंवरलाल मीणा को माफी दिलाने की फाइल तक आगे बढ़वाई। लेकिन वह फाइल किसने रोकी? क्यों रोकी?—यहीं भाजपा की अंदरूनी राजनीति का सच छिपा है।
अब आंकड़ों की भाषा में अंता की सच्चाई समझिए
कांग्रेस के प्रमोद जैन भाया ने भाजपा को 15,612 वोटों से मात दी है , भाजपा उम्मीदवार को 53,959 वोट मिले , वही निर्दलीय नरेश मीणा को 53,800 वोट मिले ,
यानी भाजपा और निर्दलीय के बीच सिर्फ 159 वोट का मामूली अंतर।
यह आंकड़ा कहता है—भाजपा वोटर उसके साथ खड़े तो रहे, लेकिन दिल से नहीं। संगठन, सरकार और बड़े नेताओं की ताकत होने के बावजूद वह निर्दलीय के बराबर पहुंच गई—यह भाजपा के लिए चेतावनी से कम नहीं।
दिलचस्प तुलना यह भी—बिहार में भाजपा 101 सीटों पर लड़ी और 90% स्ट्राइक रेट हासिल किया, लेकिन राजस्थान में एकमात्र उपचुनाव की सीट भी नहीं बचा पाई।
यानी हार सिर्फ एक सीट की नहीं—भविष्य की राजनीति का संकेत है।
अंता का यह परिणाम साफ कहता है—पार्टी जितनी बाहर से मजबूत दिखती है, उतनी भीतर से कमजोर पड़ रही है।
और जनता—सब कुछ चुपचाप देख रही है, अपने वोट से जवाब भी दे रही है।