बांग्लादेश–म्यांमार बॉर्डर पर ‘आशा का स्वर्ग’ बना पाताल लोक, हर कदम पर मौत का खतरा
म्यांमार के गृहयुद्ध का कहर अब उसकी सीमाओं से बाहर फैल चुका है। बांग्लादेश से सटी सीमा पर बसे गांवों के लिए जंगल, खेत और पगडंडियां मौत का जाल बन चुकी हैं। बारूदी सुरंगों से भरी यह सीमा उन लोगों की जिंदगी तबाह कर रही है, जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं, लेकिन हर दिन जान हथेली पर रखकर जीने को मजबूर हैं।
📌 जंगल में लकड़ी बीनते हुए उड़ गया पैर
40 वर्षीय अली हुसैन की जिंदगी एक पल में बदल गई। 2025 की शुरुआत में वह गांववालों के साथ जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने जंगल गए थे, तभी जोरदार धमाका हुआ। विस्फोट में उनका पैर उड़ गया। दर्द असहनीय था। ग्रामीणों ने खून रोकने की कोशिश की, कटे पैर को समेटा और किसी तरह अस्पताल पहुंचाया।
📌 ‘आशा का स्वर्ग’ नाम, लेकिन हकीकत खौफनाक
बांग्लादेश के बंदरबन जिले में स्थित आशाटोली गांव का अर्थ है “आशा का स्वर्ग”, लेकिन यहां की जमीन में छिपी बारूदी सुरंगें इसे पाताल लोक बना चुकी हैं। जंगल, खेत और रास्ते—all जगह मौत छिपी है। विदेशी युद्ध के हथियार अब स्थानीय ग्रामीणों की जिंदगी निगल रहे हैं।
📌 271 किलोमीटर की अनमार्क्ड मौत की सीमा
बांग्लादेश और म्यांमार के बीच 271 किलोमीटर लंबी सीमा का बड़ा हिस्सा बिना चिन्हों के है। घने जंगल, पहाड़ और नदियां यह पहचानना मुश्किल बना देती हैं कि कौन सा इलाका किस देश का है। पीढ़ियों से सीमा पार लकड़ी, खेती और छोटे व्यापार के लिए जाने वाले ग्रामीण अनजाने में बारूदी सुरंगों पर कदम रख रहे हैं।
📌 एक हादसा, कई जिंदगियां बर्बाद
अली हुसैन का पैर घुटने के ऊपर से काटना पड़ा। महीनों तक पत्नी उन्हें पीठ पर उठाकर ले जाती रही। अब वह नकली पैर और बैसाखी के सहारे चलते हैं, लेकिन नौकरी छूट चुकी है। रोज़ दवाओं पर सैकड़ों टका खर्च हो रहे हैं। मजबूरी में उनके दो छोटे बेटे स्कूल के बाद जंगल जाकर लकड़ी बीनते हैं—उसी मौत के इलाके में।
📌 यह सिर्फ एक कहानी नहीं
47 वर्षीय मोहम्मद अबू तालेब भी ऐसे ही एक विस्फोट का शिकार हुए। सूखी पत्तियों के ढेर पर कदम रखते ही धमाका हुआ और उनकी पूरी जिंदगी बदल गई। अब उनका 10 साल का बेटा स्कूल छोड़कर परिवार चलाने में जुट गया है। इलाज और नकली पैर की मरम्मत का खर्च हजारों रुपए है, जो उनके लिए नामुमकिन है।
📌 जवान उम्र, टूटा भविष्य
23 साल के नुरुल अमीन एक गाय को सीमा पार लाने की कोशिश कर रहे थे, तभी विस्फोट में उनका पैर चला गया। आज उनकी कमाई घटकर महज कुछ हजार में सिमट गई है। उनका कहना है— “यह एक परिवार के लिए काफी नहीं है, लेकिन मेरे पास कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है।”
📌 सुरक्षा बल भी नहीं सुरक्षित
नवंबर में बांग्लादेश बॉर्डर फोर्स के एक जवान की मौत हो गई, जब लैंडमाइन विस्फोट में उसके दोनों पैर उड़ गए। पुलिस के मुताबिक, सिर्फ 2025 में ही बारूदी सुरंगों से कम से कम 28 लोग घायल हो चुके हैं।
📌 दुनिया का सबसे खतरनाक देश— म्यांमार
इंटरनेशनल कैंपेन फॉर बैन ऑन लैंडमाइंस के अनुसार, म्यांमार लैंडमाइन से होने वाली मौतों के मामले में दुनिया में सबसे खतरनाक देश बन चुका है। 2024 में यहां 2,000 से ज्यादा लोगों की जान बारूदी सुरंगों के कारण गई—जो पिछले साल के मुकाबले दोगुनी है।
📌 किसकी जिम्मेदारी?
बांग्लादेश ने म्यांमार की सेना और वहां सक्रिय सशस्त्र गुटों पर सीमा क्षेत्रों में लैंडमाइन बिछाने का आरोप लगाया है। लेकिन सवाल यह है कि इन सुरंगों की कीमत निर्दोष ग्रामीण क्यों चुका रहे हैं?
🧠 युद्ध जो सीमा नहीं मानता
म्यांमार का गृहयुद्ध अब सिर्फ एक देश की समस्या नहीं रहा। यह उन गरीब ग्रामीणों की जिंदगी निगल रहा है, जो रोज़ी-रोटी के लिए जंगल में कदम रखते हैं। ‘आशा का स्वर्ग’ जैसे गांव इस बात की गवाही हैं कि जब युद्ध फैलता है, तो सबसे पहले आम इंसान कुचला जाता है—बिना हथियार, बिना सुरक्षा।