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अल्लाह का शासन’ बनाम लोकतंत्र: चुनाव प्रचार के पहले दिन ही जमात‑ए‑इस्लामी की कट्टर सोच उजागर


बांग्लादेश में 13वें आम चुनाव का प्रचार शुरू होते ही जमात‑ए‑इस्लामी का चुनावी एजेंडा विवादों में आ गया है। ढाका में आयोजित पहली ही जनसभा में ‘गुलामी या आज़ादी’ और ‘अल्लाह का शासन’ जैसे नारे लगाए गए, जिसने देश के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ढांचे को लेकर नई बहस छेड़ दी है।


जमात ने ऐसे शुरू किया चुनावी अभियान

गुरुवार को जमात‑ए‑इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान ने ढाका के मीरपुर इलाके में आदर्श स्कूल मैदान से चुनाव प्रचार का आग़ाज़ किया। सभा की शुरुआत कुरान की तिलावत से हुई और इसके बाद कार्यकर्ताओं ने धार्मिक नारों के साथ शक्ति प्रदर्शन किया। भारी भीड़ के कारण इलाके में यातायात पूरी तरह बाधित हो गया।


‘गुलामी या आज़ादी’ के नारे और धार्मिक ध्रुवीकरण

सभा में मौजूद कार्यकर्ता खुले तौर पर कहते सुने गए कि “कुरान की स्थापना के लिए जान और खून देना पड़े तो भी पीछे नहीं हटेंगे।” विश्लेषकों के मुताबिक, चुनाव को इस तरह ‘धार्मिक संघर्ष’ के रूप में पेश करना समाज में गहरे ध्रुवीकरण की आशंका पैदा करता है।


बच्चों के ज़रिये विचारधारा का प्रसार

चुनावी रैली में पहली कक्षा तक के बच्चों को भी मंच और भीड़ में शामिल किया गया। उनसे जमात के चुनाव चिन्ह ‘तराजू’ के समर्थन में नारे लगवाए गए। आलोचकों का कहना है कि यह राजनीतिक प्रचार से ज़्यादा बच्चों के मन में कट्टर विचारधारा भरने की कोशिश है।


‘अल्लाह का शासन’ की खुली बात

जमात कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वे “जुल्म को हराकर अल्लाह का शासन स्थापित करेंगे।” यह बयान लोकतांत्रिक संविधान और नागरिक शासन की बजाय धार्मिक शासन की सोच को दर्शाता है। जमात समर्थक कबीर अहमद ने कहा, “अगर अल्लाह ने चाहा तो जमात सरकार बनाएगी।”


विशेषज्ञों की चेतावनी

वरिष्ठ पत्रकार सलाह उद्दीन शोएब चौधरी के अनुसार, जमात का यह अभियान केवल धार्मिक अभिव्यक्ति नहीं बल्कि धार्मिक निरंकुशता का रणनीतिक उपयोग है। जब राजनीति को “इस्लाम बनाम उसके दुश्मन” के फ्रेम में रखा जाता है, तो असहमति की कोई जगह नहीं बचती और लोकतांत्रिक मूल्यों को सीधा नुकसान पहुंचता है।


चुनाव की आड़ में असली मकसद?

अब तक के चुनावी इतिहास में जमात‑ए‑इस्लामी को सीमित जनसमर्थन मिला है। विश्लेषकों का मानना है कि इस बार जनमत संग्रह और चुनावी माहौल का इस्तेमाल कर पार्टी अपने प्रभाव को वास्तविकता से बड़ा दिखाने और धार्मिक एजेंडे को केंद्र में लाने की कोशिश कर रही है।


जमात‑ए‑इस्लामी का चुनाव प्रचार यह संकेत देता है कि आने वाले चुनावों में विकास, अर्थव्यवस्था और सुशासन से ज़्यादा धर्म बनाम लोकतंत्र की बहस हावी रह सकती है। यही वजह है कि बांग्लादेश का उदारवादी और लोकतांत्रिक वर्ग इस चुनावी रुख को लेकर गहरी चिंता जता रहा है।

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