बांग्लादेश में अवामी लीग के हिंदू नेता की हिरासत में मौत: परिवार का आरोप—इलाज में लापरवाही बनी वजह
बांग्लादेश में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग से जुड़े एक हिंदू नेता की पुलिस हिरासत में मौत ने राजनीतिक और मानवाधिकार बहस को तेज़ कर दिया है। 60 वर्षीय प्रोलॉय चाकी की मृत्यु राजशाही मेडिकल कॉलेज अस्पताल में इलाज के दौरान हुई। परिवार का आरोप है कि हिरासत में रहते हुए उन्हें समय पर और पर्याप्त चिकित्सा सहायता नहीं दी गई, जबकि प्रशासन इन दावों को नकार रहा है।
🧑⚖️ कौन थे प्रोलॉय चाकी?
- अवामी लीग की पबना जिला इकाई के सांस्कृतिक मामलों के सचिव
- पेशे से गायक और म्यूजिक डायरेक्टर, 1990 के दशक के चर्चित सांस्कृतिक कार्यकर्ता
- पबना के श्री श्री राम कृष्ण शीबाश्रम में सचिव के रूप में भी सेवाएं
चाकी 2024 के छात्र आंदोलन से जुड़े एक कथित विस्फोटक मामले में हिरासत में थे—यही आंदोलन आगे चलकर ‘जुलाई विद्रोह’ में बदला, जिसके बाद शेख हसीना सत्ता से बाहर हुईं और भारत चली गईं।
🏥 मौत कैसे हुई?
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रविवार को राजशाही मेडिकल कॉलेज अस्पताल में इलाज के दौरान प्रोलॉय चाकी का निधन हो गया।
जेल प्रशासन का कहना है कि वह डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त थे। उनकी हालत बिगड़ने पर पहले पबना सदर अस्पताल और फिर राजशाही मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर किया गया।
🚨 परिवार के गंभीर आरोप
प्रोलॉय चाकी के बेटे, सोनी चाकी का कहना है कि:
- उनके पिता को ऐसे समय गिरफ्तार किया गया जब किसी मामले में उनका नाम नहीं था।
- बाद में उन्हें 4 अगस्त की हिंसा से जुड़े विस्फोटक केस में दिखाकर जेल भेजा गया।
- हिरासत में उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती रही, लेकिन परिवार को समय पर सूचना नहीं दी गई।
- अस्पताल पहुंचने पर भी उन्हें उचित इलाज नहीं मिला, जिससे उनकी मौत हो गई।
परिवार का दावा है कि यदि समय पर चिकित्सा सहायता मिलती तो जान बचाई जा सकती थी।
👮 प्रशासन का पक्ष
पबना जिला जेल अधीक्षक ओमोर फारूक ने परिवार के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि:
- चाकी को उनके मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार दवाएं दी गईं।
- हालत गंभीर होते ही उन्हें अस्पताल भेजा गया।
- राजशाही मेडिकल कॉलेज अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हुई।
प्रशासन का कहना है कि हिरासत में लापरवाही का आरोप तथ्यात्मक नहीं है।
🧩 राजनीतिक और सामाजिक असर
यह मामला ऐसे वक्त सामने आया है जब बांग्लादेश में राजनीतिक ध्रुवीकरण, अल्पसंख्यक सुरक्षा और पुलिस हिरासत में मौतों पर अंतरराष्ट्रीय निगाहें टिकी हैं।
एक तरफ परिवार न्यायिक जांच की मांग कर रहा है, दूसरी तरफ सरकार और जेल प्रशासन अपने कदमों को नियमों के अनुरूप बता रहे हैं। यह टकराव आने वाले दिनों में कानूनी और राजनीतिक बहस को और तेज कर सकता है।
प्रोलॉय चाकी की हिरासत में हुई मौत सिर्फ एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि बांग्लादेश में न्याय, अल्पसंख्यक अधिकार और हिरासत में चिकित्सा मानकों पर बड़े सवाल खड़े करती है। अब सबकी नजर इस पर है कि क्या इस मामले में स्वतंत्र जांच होती है या यह आरोप-प्रत्यारोप तक ही सीमित रह जाएगा।