“लाउडस्पीकर की आवाज तय हो, वरना लोग शहर छोड़ देंगे” हवामहल विधायक बालमुकुंद आचार्य ने दोहराई मांग, बोले– रोज बढ़ रही आवाज
जयपुर के हवामहल से बीजेपी विधायक बालमुकुंद आचार्य ने मस्जिदों में लाउडस्पीकर की आवाज को लेकर एक बार फिर बयान देकर सियासी और सामाजिक बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि अगर समय और ध्वनि-स्तर तय नहीं किया गया, तो आम लोगों को मजबूरी में शहर छोड़ना पड़ सकता है। विधायक ने साफ किया कि उनका मुद्दा किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और नियमों के पालन से जुड़ा है।
🔹 विधानसभा क्षेत्र का हवाला देकर रखी बात
गुरुवार (29 जनवरी) को यह मुद्दा उठाने के बाद शुक्रवार (30 जनवरी) को मीडिया से बातचीत में बालमुकुंद आचार्य ने कहा कि उनकी विधानसभा में कई मस्जिद और मदरसे हैं और उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस शासनकाल में भी मस्जिदें बनीं और सभी को अपने-अपने धर्म के अनुसार पूजा-पद्धति का अधिकार है।
🔹 “रोजाना बढ़ाई जा रही है लाउडस्पीकर की आवाज”
विधायक का आरोप है कि लाउडस्पीकर की आवाज धीरे-धीरे बढ़ाई जा रही है। उन्होंने कहा कि हर मंजिल पर 8 से 10 स्पीकर लगा दिए गए हैं, जिससे आसपास रहने वाले लोगों को परेशानी हो रही है।
🔹 बच्चों और मरीजों की शिकायतों का जिक्र
बालमुकुंद आचार्य ने कहा कि उनके क्षेत्र में रहने वाले बच्चे लगातार शिकायत कर रहे हैं कि तेज आवाज के कारण पढ़ाई में दिक्कत होती है। इसके अलावा माइग्रेन और अन्य बीमारियों से जूझ रहे लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
🔹 “भजन-सत्संग 10 बजे बंद होते हैं, तो नियम सब पर लागू हों”
बीजेपी विधायक ने सवाल उठाया कि जब सत्संग, भजन और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों को रात 10 बजे के बाद बंद करने के निर्देश दिए जाते हैं और उनका पालन भी किया जाता है, तो यही नियम सभी पर समान रूप से लागू क्यों नहीं होते। उन्होंने कहा कि अगर हम नियम मान सकते हैं, तो दूसरों को भी मानना चाहिए।
🔹 “मुद्दा धर्म नहीं, नियम और संतुलन का है”
बालमुकुंद आचार्य ने स्पष्ट किया कि वह सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। उनका कहना है कि सनातन धर्म में रोजाना इस तरह तेज आवाज में लाउडस्पीकर नहीं लगाए जाते। कभी-कभार उत्सवों में ऐसा हो सकता है, लेकिन हर दिन ऐसा माहौल बनाना उचित नहीं है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब देशभर में धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर की आवाज और ध्वनि प्रदूषण को लेकर बहस चल रही है। एक तरफ धार्मिक स्वतंत्रता का सवाल है, तो दूसरी तरफ बच्चों की पढ़ाई, मरीजों की सेहत और शहरी जीवन की शांति। आने वाले दिनों में प्रशासन इस पर क्या रुख अपनाता है, यह देखना अहम होगा।