आर्कटिक में हथियारों की होड़ तेज, दुनिया के सबसे बर्फीले इलाके में 8 देशों की सैन्य ताकत आमने-सामने
धरती के सबसे उत्तरी और बर्फ से ढके इलाके आर्कटिक में अब केवल हिमखंड नहीं, बल्कि वैश्विक ताकतों की सैन्य रणनीतियां टकरा रही हैं। औसतन –34 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले इस क्षेत्र में रूस, अमेरिका, कनाडा, डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड और आइसलैंड अपनी सैन्य मौजूदगी लगातार मजबूत कर रहे हैं। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी रुचि और रूस की परमाणु तैयारियों ने आर्कटिक को नई जियो-पॉलिटिकल जंग का केंद्र बना दिया है।
आर्कटिक क्यों बन गया वैश्विक शक्तियों का रणक्षेत्र
आर्कटिक केवल बर्फीला इलाका नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टि से बेहद अहम क्षेत्र है। यहां से उत्तरी अटलांटिक, यूरोप और उत्तरी अमेरिका तक पहुंच आसान होती है। इसके अलावा भविष्य में प्राकृतिक संसाधनों और नए समुद्री मार्गों की संभावनाएं भी इसे रणनीतिक रूप से अहम बनाती हैं।जलवायु परिवर्तन के चलते जैसे-जैसे बर्फ पिघल रही है, आर्कटिक की सैन्य और आर्थिक अहमियत तेजी से बढ़ रही है।
रूस: आर्कटिक का सबसे बड़ा सैन्य खिलाड़ी
आर्कटिक का लगभग आधा भूभाग रूस के नियंत्रण में है। 2005 के बाद से रूस ने सोवियत काल के कई सैन्य अड्डों को दोबारा सक्रिय और आधुनिक किया है। नोवाया जेमल्या द्वीपसमूह परमाणु परीक्षणों का ऐतिहासिक केंद्र रहा है और हाल के वर्षों में यहां से परमाणु-संचालित ब्यूरवेस्टनिक क्रूज मिसाइल का परीक्षण भी किया गया।रूस के लिए आर्कटिक उसकी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता की रीढ़ है, जहां से सेकेंड-स्ट्राइक क्षमता संचालित होती है।
कोला प्रायद्वीप और उत्तरी बेड़ा: रूस की परमाणु ढाल
यूरोपीय आर्कटिक में स्थित कोला प्रायद्वीप में रूस की लगभग दो-तिहाई सेकेंड-स्ट्राइक परमाणु क्षमता तैनात है। यहीं सेवेरोमोर्स्क स्थित उत्तरी बेड़े का मुख्यालय है, जो कई परमाणु-सशस्त्र पनडुब्बियों का संचालन करता है।नॉर्वे और यूरोप के बीच बैरेंट्स सागर रूस के लिए रणनीतिक लाइफलाइन है, जिसे खुला रखना मॉस्को के लिए अनिवार्य है।
अमेरिका और कनाडा: NORAD से आर्कटिक की निगरानी
1957 से अमेरिका और कनाडा NORAD के तहत संयुक्त रूप से मिसाइल और हवाई खतरों से सुरक्षा कर रहे हैं। अब इस सिस्टम का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। कनाडा ओवर-द-होराइजन रडार सिस्टम तैनात कर रहा है, जबकि अमेरिका ‘गोल्डन डोम’ मिसाइल डिफेंस प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए यूरोप और उत्तरी अमेरिका की रक्षा कड़ी का अहम हिस्सा बन चुका है।
ग्रीनलैंड में अमेरिकी मौजूदगी और अलास्का की ताकत
डेनमार्क के साथ रक्षा समझौते के तहत अमेरिका के पास उत्तरी ग्रीनलैंड में पिटफिक स्पेस बेस है। इसके अलावा अलास्का में आठ सैन्य ठिकानों पर करीब 22 हजार अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। अलास्का और ग्रीनलैंड अमेरिका को रूस और आर्कटिक क्षेत्र पर सीधी निगरानी की क्षमता देते हैं।
डेनमार्क: ग्रीनलैंड की सुरक्षा की जिम्मेदारी
डेनमार्क की संयुक्त आर्कटिक कमान का मुख्यालय नुउक में है। यहां सीमित संख्या में सैन्य कर्मी हैं, लेकिन पूर्वोत्तर ग्रीनलैंड में डॉग स्लेज पेट्रोल जैसी यूनिट विषम परिस्थितियों में लंबी दूरी की गश्त करती है। कम संसाधनों के बावजूद डेनमार्क ग्रीनलैंड की संप्रभुता बनाए रखने पर जोर दे रहा है।
स्वीडन और फिनलैंड: नाटो के नए आर्कटिक खिलाड़ी
स्वीडन और फिनलैंड के पास सीमित आर्कटिक बेस हैं, लेकिन नाटो में शामिल होने के बाद दोनों देश अपनी सेनाओं को गठबंधन की रणनीति के अनुसार ढाल रहे हैं। नाटो का विस्तार रूस के लिए आर्कटिक में नई सुरक्षा चुनौती बन गया है।
नॉर्वे: नाटो की आंख और कान
नॉर्वे आर्कटिक और उत्तरी अटलांटिक के विशाल समुद्री क्षेत्र की निगरानी करता है। यहां F-35 लड़ाकू विमानों वाले एयरबेस, नौसेना अड्डे और नाटो सहयोगियों के लिए रिसेप्शन सेंटर मौजूद हैं। नॉर्वे रूस और नाटो के बीच आर्कटिक फ्रंटलाइन की भूमिका निभा रहा है।
आइसलैंड: बिना सेना के भी रणनीतिक अहमियत
आइसलैंड के पास स्थायी सेना नहीं है, लेकिन नाटो सदस्य होने के कारण यहां अमेरिकी समुद्री-गश्ती विमान और नाटो फाइटर जेट्स की रोटेशनल तैनाती होती रहती है। उत्तरी अटलांटिक में आइसलैंड नाटो की एयर और नेवल रणनीति का अहम हिस्सा है।
बर्फ के नीचे छिपी वैश्विक जंग
आर्कटिक अब केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सैन्य और सामरिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुका है। ग्रीनलैंड से लेकर कोला प्रायद्वीप तक, दुनिया की बड़ी ताकतें यहां अपनी स्थिति मजबूत कर रही हैं।