अनिरुद्धाचार्य की मुश्किलें बढ़ीं, महिलाओं पर टिप्पणी का मामला पहुंचा कोर्ट
महिलाओं पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले चर्चित कथावाचक अनिरुद्धाचार्य पर कानूनी शिकंजा और कसता नज़र आ रहा है। अक्टूबर 2025 में दिए गए बयान को लेकर अदालत ने अब उनके खिलाफ आधिकारिक रूप से परिवाद दर्ज कर लिया है। इससे मामले की गंभीरता बढ़ गई है और अनिरुद्धाचार्य को कोर्ट में पेश होकर अपना जवाब देना पड़ेगा। इस बीच राजनीतिक गलियारों में भी गहमागहमी बढ़ गई है, खासकर उद्धव ठाकरे गुट की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इसे लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दर्ज की है।
अदालत ने अनिरुद्धाचार्य के खिलाफ परिवाद किया दर्ज
अक्टूबर 2025 में एक कथा कार्यक्रम के दौरान महिलाओं पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने को लेकर अनिरुद्धाचार्य लंबे समय से विवादों में बने हुए थे। शिकायत और सबूतों के आधार पर अब अदालत ने उनके खिलाफ आधिकारिक रूप से परिवाद दर्ज कर लिया है। अदालत का यह कदम मामले को औपचारिक रूप से सुनवाई के चरण में ले आता है। अब अनिरुद्धाचार्य को अदालत में उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देना होगा, जिससे कानूनी प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है।
आपत्तिजनक बयान पर राजनीतिक हलचल तेज, प्रियंका चतुर्वेदी का पलटवार
इस पूरे विवाद पर शिवसेना (उद्धव ठाकरे) गुट की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की गरिमा पर चोट करने वाले किसी भी बयान को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। साथ ही उन्होंने अदालत के इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में कानून को तुरंत और निष्पक्ष रूप से कार्रवाई करनी चाहिए। चतुर्वेदी की प्रतिक्रिया को समाज में बढ़ते लैंगिक सम्मान के मुद्दों से जोड़कर देखा जा रहा है।
समाज में बहस—धार्मिक प्रवचनों में भाषा की मर्यादा पर उठे प्रश्न
अनिरुद्धाचार्य के बयान के बाद समाज के विभिन्न वर्गों में यह बहस तेज हो गई है कि धार्मिक प्रवचनों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में महिलाओं को अपमानित करने वाली भाषा का उपयोग क्यों किया जाता है। कई सामाजिक संगठनों ने कहा कि ऐसे बयानों का प्रभाव समाज के संवेदनशील वर्गों पर पड़ता है, इसलिए कथावाचकों समेत सार्वजनिक मंचों पर बोलने वाले लोगों को जिम्मेदारी का एहसास होना चाहिए।
कानूनी प्रक्रिया के अगले चरण पर निगाहें
परिवाद दर्ज होने के बाद अगला महत्वपूर्ण चरण अनिरुद्धाचार्य का कोर्ट में प्रस्तुत होना है। उनकी तरफ से क्या तर्क दिए जाते हैं और अदालत किन बिंदुओं पर ध्यान देती है, यह आगे की दिशा तय करेगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आरोप साबित होते हैं तो उन्हें आपराधिक कृत्य के तहत सजा भी हो सकती है।
मामला सिर्फ बयान का नहीं, समाजिक संवेदनशीलता का भी है
इस विवाद के कानूनी पहलू जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही बड़ा मुद्दा सामाजिक संवेदनशीलता और महिलाओं के सम्मान का भी है। सार्वजनिक मंचों पर दिए गए शब्द, खासतौर पर जब वे धार्मिक या सामाजिक प्रभाव रखने वाले व्यक्तियों द्वारा बोले जाते हैं, समाज में गहरा असर छोड़ते हैं। इस मामले ने फिर से यह सवाल खड़ा किया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएं क्या हैं और उन सीमाओं को पार करने पर किस तरह की जवाबदेही तय होनी चाहिए।