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अलवर में 90 वर्षीय बुजुर्ग की भव्य शव यात्रा, जयपुर से मंगाया हाथी; समाज ने दिखाया असली एकजुटता


अलवर में हाल ही में 90 वर्षीय बुजुर्ग जागा के निधन पर उनकी अंतिम विदाई एक यादगार और भव्य आयोजन बन गई। हाथी, घोड़े, डीजे और समाज के सदस्यों की सहभागिता ने इस शव यात्रा को खास और अद्भुत बना दिया।


1. हाथी और भव्य शव यात्रा ने आकर्षित किया ध्यान

अलवर के सूर्य नगर डी-ब्लॉक से एनईबी श्मशान घाट तक निकली शव यात्रा ने शहरवासियों का ध्यान अपनी ओर खींचा। खास बात यह रही कि जयपुर से विशेष रूप से मंगवाया गया हाथी शव यात्रा के सबसे आगे चल रहा था। हाथी पर पारंपरिक सजावट की गई थी और यह पूरे कार्यक्रम का आकर्षण केंद्र बन गया। हाथी के पीछे घोड़े, डीजे वाहन और समाज के लोग यात्रा में शामिल थे। डीजे की धुन पर युवा नाचते-गाते नजर आए, वहीं पारंपरिक बाजों की ध्वनि ने माहौल को और भी जीवंत बना दिया।

यह दिखाता है कि समाज अपने बुजुर्गों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने के लिए परंपराओं का अद्वितीय मिश्रण अपनाता है।


2. आपसी सहयोग से जुटाया गया आयोजन का खर्च

परिजनों और समाज के सदस्यों ने बताया कि इस आयोजन पर लगभग 3 लाख रुपये खर्च हुए। यह राशि समाज के लोगों ने आपसी सहयोग से जुटाई। गाड़िया लोहार समाज में यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है कि किसी भी सदस्य के निधन पर समाज आर्थिक और सामाजिक रूप से साथ खड़ा होता है।

यह पहल समाज की मजबूती और पारिवारिक एकजुटता को उजागर करती है। अकेले परिवार के लिए भारी खर्च भी समाज की साझा जिम्मेदारी बन जाता है।


3. समाज की परंपरा और बुजुर्गों के प्रति सम्मान

शव यात्रा में मृतक के पोते रोहित ने बताया, “दादा समाज में अत्यंत सम्मानित थे। हमारे समाज में किसी बुजुर्ग के निधन पर पूरा समाज मिलकर सहयोग करता है। इसी सहयोग से जयपुर से हाथी मंगवाया गया और भव्य शव यात्रा निकाली गई। यह हमारी पुरानी परंपरा है, जिसे हम आज भी श्रद्धा के साथ निभाते हैं।”

यह दर्शाता है कि गाड़िया लोहार समाज में बुजुर्गों का सम्मान केवल शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि हर आयोजन में परिलक्षित होता है।


4. मार्ग में पुष्पवर्षा और समाज की सक्रिय भागीदारी

शव यात्रा के दौरान मार्ग में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। कई स्थानों पर लोगों ने पुष्पवर्षा कर श्रद्धांजलि दी। समाज के सदस्यों ने पूरी व्यवस्था संभाली, जिससे यात्रा शांतिपूर्ण और अनुशासित रही। अंतिम संस्कार के समय भावनाओं का मिश्रण देखा गया—दुःख और श्रद्धा के साथ समाज की एकजुटता और परंपराओं पर गर्व भी नजर आया।

यह घटना केवल अंतिम विदाई नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक संस्कृति और सांस्कृतिक परंपराओं का जीवंत उदाहरण बन गई।

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