OTT पर आई ‘अखंडा 2: तांडवम’—जब एक्शन अनजाने में कॉमेडी बन जाए
नंदमुरी बालकृष्ण (NBK) की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘अखंडा 2: तांडवम’ अब नेटफ्लिक्स (हिंदी डब सहित) पर स्ट्रीम हो रही है। बॉक्स ऑफिस पर भले ही यह कोई बड़ा चमत्कार नहीं कर पाई हो और ओटीटी ट्रेंडिंग में भी जगह न बना सकी हो, फिर भी इसे देखने की एक अलग वजह है—यह दिखाती है कि कैसे स्टार-पावर पर जरूरत से ज्यादा भरोसा एक एक्शन फिल्म को अनजाने में सुपर कॉमेडी बना सकता है।
कहानी: सब कुछ डाल दिया गया है
फिल्म में देशभक्ति, अध्यात्म, विज्ञान, कुंभ, शिक्षा—हर थीम मौजूद है। मगर इन्हें जोड़ने की जगह ठीक से बुना नहीं गया, नतीजा यह कि कथा कई जगहों पर भटकती हुई लगती है। ऐसा महसूस होता है जैसे कहानी क्रम से नहीं, बल्कि “जो सूझा, होता गया” के अंदाज़ में आगे बढ़ती है।
निर्देशन और लेखन
बोयापती श्रीनू ने पहले ‘अखंडा’ जैसी ब्लॉकबस्टर दी थी, जिसमें एक स्पष्ट दिशा और मजबूत कथा थी। लेकिन सीक्वल में वही पकड़ गायब दिखती है। बड़े विचार हैं, पर उन्हें साधने का धैर्य और संतुलन नहीं—जिससे फिल्म की गंभीरता कई बार अनायास हास्य में बदल जाती है।
अभिनय: ओवर-द-टॉप से आगे
- दिग्गज कलाकारों से अत्यधिक ओवरएक्टिंग करवाई गई है।
- संयुक्ता प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहती हैं।
- हर्षाली मल्होत्रा (मुन्नी) का किरदार भावनात्मक असर नहीं बना पाता।
- NBK को ऐसे पेश किया गया है मानो उन्हें अभिनय की जरूरत ही न हो—जो भी करें, वही “करिश्मा” मान लिया जाए।
एक्शन, VFX और डायलॉग
एक्शन सीक्वेंस इतने अतिरंजित हैं कि दर्शक सोचने पर मजबूर हो जाता है—“इतनी दूर की सोच आखिर क्यों?”
VFX कमजोर है और डायलॉग डिलिवरी कई बार समझने में मेहनत करवाती है। नतीजा: गंभीरता की जगह हंसी आ जाती है।
तो फिर क्यों देखें?
अगर आप सिने-लवर हैं और यह देखना चाहते हैं कि
- कैसे तमाम संसाधनों के बावजूद एक हिट फिल्म का कमजोर सीक्वल बन सकता है,
- कैसे कलाकार जब कला से बड़ा हो जाता है, तो फिल्म दिशा खो सकती है—
तो ‘अखंडा 2: तांडवम’ आपके लिए एक केस-स्टडी है।
(वैसे “अनजानी कॉमेडी” के तौर पर देखने में यह कमाल की एंटरटेनिंग भी साबित हो सकती है!)
तुलना और टिप्पणी
कई दर्शक इसे उस श्रेणी में रख रहे हैं जहां भव्यता और अतिरंजनाएँ कंटेंट को ढक लेती हैं। कुछ लोग तो मजाक में इसे ‘इंडियन 2’ जैसी फिल्मों की लाइन में खड़ा कर रहे हैं—जहां उम्मीदें बड़ी थीं, पर निष्पादन कमजोर रहा।
‘अखंडा 2: तांडवम’ यह याद दिलाती है कि
स्टार-पावर कंटेंट का विकल्प नहीं हो सकती।
मजबूत विचारों को बिना कसावट के पेश किया जाए तो एक्शन, ड्रामा और भव्यता—सब मिलकर भी फिल्म को नहीं बचा पाते। हां, “सो-बैड-इट्स-फन” कैटेगरी में यह आपको जरूर एंटरटेन कर सकती है।