नेहरू परिवार से जुड़ाव, आज़ादी की लड़ाई और शोले का रहीम चाचा: ए.के. हंगल की अनकही कहानी
परदे पर अमर, जिंदगी में संघर्षों से भरे
हिंदी सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो बिना हीरो बने भी इतिहास रच देते हैं। ए.के. हंगल उन्हीं नामों में शामिल हैं। शोले के रहीम चाचा हों या लगान के शंभू काका—उनकी मौजूदगी ने हर फिल्म को गहराई दी। आज उनकी जयंती पर उनकी जिंदगी के उन पहलुओं को जानना जरूरी है, जिनसे बहुत कम लोग वाकिफ हैं।
पहले प्रधानमंत्री नेहरू से था पारिवारिक रिश्ता
कम ही लोग जानते हैं कि ए.के. हंगल का रिश्ता देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के परिवार से भी जुड़ा था। हंगल सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिसने देश की आज़ादी और संस्कृति—दोनों को करीब से जिया।
सियालकोट में जन्म, आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका
ए.के. हंगल का जन्म 1 फरवरी 1914 को सियालकोट (अब पाकिस्तान) में हुआ था। फिल्मों से पहले उनका जीवन देशभक्ति को समर्पित था। 1929 से 1947 तक वे भारत की आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय रहे और इसी दौरान उन्हें कराची जेल में करीब तीन साल कैद भी काटनी पड़ी।
जेल के बाद संघर्ष, मुंबई में दर्जी का काम
आजादी के बाद हंगल भारत आए और मुंबई में बस गए। उनकी जीवनी Life and Times of A.K. Hangal के मुताबिक, फिल्मों से पहले उन्होंने दर्जी का काम सीखा था। पिता के एक मित्र की सलाह पर उन्होंने एक अंग्रेज दर्जी से यह हुनर सीखा और लंबे समय तक इसी काम से गुजारा किया।
थिएटर से फिल्मों तक का सफर
दर्जी का काम करते हुए भी हंगल का झुकाव अभिनय की ओर बना रहा। 1949 से 1965 तक वे भारतीय थिएटर से जुड़े रहे और कई नाटकों में अभिनय किया। यही अनुभव आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
52 साल की उम्र में किया फिल्मी डेब्यू
ए.के. हंगल ने 52 साल की उम्र में फिल्मों में कदम रखा—जो अपने आप में मिसाल है। साल 1966 में बसु भट्टाचार्य की फिल्म तीसरी कसम से उन्होंने बॉलीवुड में डेब्यू किया। इसके बाद उनके करियर ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि वे हर बड़े निर्देशक की पसंद बन गए।
शोले, नमक हराम और 200 से ज्यादा फिल्में
हंगल ने नमक हराम, शौकीन, शोले, आंधी, अवतार, अर्जुन, तपस्या जैसी फिल्मों में दमदार भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने राजेश खन्ना समेत लगभग हर बड़े सुपरस्टार के साथ काम किया। कुल मिलाकर वे 200 से ज्यादा फिल्मों का हिस्सा रहे।
छोटे किरदार, लेकिन गहरी छाप
ए.के. हंगल अक्सर पिता, दादा या बुजुर्ग के रोल में दिखे, लेकिन उनकी अदाकारी इतनी प्रभावशाली होती थी कि किरदार छोटा होने के बावजूद यादगार बन जाता था। “इतना सन्नाटा क्यों है भाई…” जैसे डायलॉग आज भी सिनेमा प्रेमियों की जुबान पर हैं।
टीवी, फैशन शो और पद्म भूषण सम्मान
हंगल ने टीवी सीरियल मधुबाला में भी काम किया। उम्र के आखिरी पड़ाव में भी उनका जज़्बा कम नहीं हुआ—एक फैशन शो में वे व्हीलचेयर पर रैंप वॉक कर चुके थे। उनके योगदान को सम्मान देते हुए साल 2006 में उन्हें पद्म भूषण से नवाजा गया।
गुमनामी में हुआ अंत
26 अगस्त 2012 को 98 वर्ष की उम्र में ए.के. हंगल का निधन हो गया। इतने बड़े योगदान के बावजूद उनका आखिरी वक्त आर्थिक और सामाजिक संघर्षों से घिरा रहा—जो हिंदी सिनेमा के कड़वे सच को भी उजागर करता है।
क्यों आज भी प्रासंगिक हैं ए.के. हंगल
ए.के. हंगल सिर्फ अभिनेता नहीं थे, वे अनुभव, विचार और इतिहास को पर्दे पर जीने वाले कलाकार थे। उनका जीवन बताता है कि अभिनय उम्र या शोहरत का मोहताज नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और सच्चाई की मांग करता है।