Save Aravalli: आखिर क्या है ‘अरावली’ शब्द का मतलब? क्यों संकट में है भारत की सबसे पुरानी पहाड़ श्रृंखला
क्यों फिर चर्चा में है अरावली
भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला अरावली एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद सोशल मीडिया पर #SaveAravalli अभियान तेज हो गया है। पर्यावरणविदों का कहना है कि नई कानूनी परिभाषा से अरावली का बड़ा हिस्सा संरक्षण से बाहर हो सकता है, जिससे इसके अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा है।
🌍 ‘अरावली’: भारत की पहचान बताने वाली पहाड़ियां
पर्यावरण कार्यकर्ता प्रणय लाल ने अपने चर्चित लेख “अरावली: एक खोया हुआ पहाड़” में लिखा था कि अगर कोई तीन अरब साल पहले धरती को देखता, तो भारत की उत्तरी सीमा बताने वाली एकमात्र स्पष्ट पहचान अरावली पर्वत श्रृंखला होती। आज वही अरावली मानवीय लालच और अल्पकालिक विकास के दबाव में सिकुड़ती जा रही है।
📖 अरावली शब्द का मतलब क्या है? (Sanskrit Origin)
‘अरावली’ शब्द संस्कृत से लिया गया है और इसमें दो शब्द शामिल हैं—
- ‘आरा’: जिसका अर्थ है रिज, धार या ऊंची पर्वत आकृति
- ‘वली’: जिसका अर्थ है पंक्ति, श्रृंखला या लाइन
इस तरह अरावली का शाब्दिक अर्थ हुआ – “चोटियों की श्रृंखला” या “पहाड़ियों की कतार”। नाम ही इसकी भौगोलिक बनावट और ऐतिहासिक पहचान को दर्शाता है।
🏔️ भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला
अरावली को दुनिया के सबसे पुराने फोल्ड माउंटेन सिस्टम में गिना जाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इसकी उम्र लगभग 3 अरब साल तक हो सकती है। यह पर्वत श्रृंखला गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है।
🌱 अरावली क्यों है पर्यावरण के लिए जरूरी
अरावली सिर्फ पहाड़ों की कतार नहीं, बल्कि उत्तर भारत की पर्यावरणीय रीढ़ है।
- यह थार रेगिस्तान के फैलाव को रोकती है
- भूजल रिचार्ज में अहम भूमिका निभाती है
- जैव विविधता और वन्यजीवों का प्राकृतिक आश्रय है
- दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में प्रदूषण संतुलन में मदद करती है
⚖️ Supreme Court का फैसला और नई परिभाषा
20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की एक नई कानूनी परिभाषा तय की। अब केवल वही भू-आकृतियां अरावली मानी जाएंगी, जो अपने आसपास के इलाके से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची हों।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस मानक से अरावली का लगभग 90% क्षेत्र कानूनी सुरक्षा से बाहर हो सकता है।
🚨 नई परिभाषा से क्या खतरे हैं
अगर यह परिभाषा लागू होती है तो:
- निचली पहाड़ियों पर खनन और रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स आसान हो जाएंगे
- भूजल स्तर और गिरेगा
- रेगिस्तान का विस्तार तेज होगा
- पहले से प्रदूषण और जल संकट झेल रहे इलाके और असुरक्षित हो जाएंगे
⏪ पहले भी दी जा चुकी है चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने खुद 2018 में माना था कि अवैध खनन के कारण अरावली की 31 पहाड़ियां पूरी तरह गायब हो चुकी हैं। इसके बावजूद कोर्ट ने केंद्र सरकार के 2010 के मानदंडों को अपनाया, जिससे मौजूदा विवाद और गहरा गया है।
विकास बनाम अस्तित्व
अरावली को लेकर बहस सिर्फ कानूनी परिभाषा की नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि क्या विकास की कीमत पर्यावरण का विनाश होनी चाहिए। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अरावली कमजोर पड़ी, तो इसका असर सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उत्तर भारत की जलवायु, पानी और जीवन पर पड़ेगा।