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वकीलों की हड़ताल के बीच सांसद अमृतपाल सिंह की अदालत में अनोखी दलील, खुद बने अपने केस के वकील..

देश की राजनीति और न्याय व्यवस्था के बीच उस वक्त एक असामान्य तस्वीर सामने आई, जब जेल में बंद सांसद अमृतपाल सिंह ने वकीलों की हड़ताल के कारण खुद ही अपनी पैरोल याचिका पर अदालत में बहस की। संसद के शीतकालीन सत्र में शामिल होने की अनुमति मांग रहे अमृतपाल सिंह ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए व्यक्तिगत रूप से अपनी बात रखी। यह मामला न सिर्फ संवैधानिक अधिकारों बल्कि जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है।


वकीलों की हड़ताल बनी बाधा, सांसद ने खुद संभाली कमान

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में उस समय असाधारण स्थिति देखने को मिली, जब वकीलों की चल रही हड़ताल के चलते सांसद अमृतपाल सिंह को अपने ही मामले की पैरवी खुद करनी पड़ी। जेल में बंद होने के बावजूद उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कोर्ट के सामने अपनी पैरोल याचिका पर दलीलें पेश कीं। यह याचिका संसद के शीतकालीन सत्र में भाग लेने की अनुमति से जुड़ी हुई है।


संसद सत्र में शामिल होने के अधिकार पर कानूनी टकराव

अमृतपाल सिंह ने राज्य सरकार द्वारा पैरोल देने से इनकार किए जाने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनका तर्क है कि एक निर्वाचित सांसद के रूप में संसद सत्र में भाग लेना उनका संवैधानिक दायित्व और अधिकार दोनों है। उन्होंने अदालत को बताया कि संसद सत्र में अनुपस्थिति सीधे तौर पर उनके संसदीय क्षेत्र के प्रतिनिधित्व को प्रभावित करती है।


वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से कोर्ट में रखी दलीलें

हाईकोर्ट की कार्यवाही के दौरान अमृतपाल सिंह जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए। उन्होंने साफ कहा कि वकीलों की हड़ताल के कारण उन्हें न्यायिक प्रक्रिया में देरी का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए वे खुद अपनी याचिका पर बहस कर रहे हैं। यह दृश्य न्यायिक इतिहास में एक दुर्लभ उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है।


राज्य सरकार के फैसले पर उठे सवाल

राज्य सरकार ने सुरक्षा कारणों और कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए पैरोल देने से इनकार किया है। हालांकि अमृतपाल सिंह का कहना है कि उन्हें पहले भी सीमित अवधि के लिए बाहर जाने की अनुमति दी जा चुकी है, ऐसे में संसद सत्र के लिए पैरोल न देना तर्कसंगत नहीं है। यह मामला अब प्रशासनिक विवेक और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन का मुद्दा बन गया है।


कानूनी जानकारों की नजर में मामला क्यों अहम

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह केस भविष्य में उन जनप्रतिनिधियों के लिए मिसाल बन सकता है जो न्यायिक हिरासत में रहते हुए भी संसदीय जिम्मेदारियों का निर्वहन करना चाहते हैं। अदालत का फैसला यह तय कर सकता है कि सांसद के अधिकारों की सीमा कहां तक है और राज्य सरकार का विवेक कितना व्यापक माना जाएगा।


अब हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी निगाहें

फिलहाल हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई जारी रखते हुए सभी पक्षों की दलीलें दर्ज कर ली हैं। अब सबकी निगाहें अदालत के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि सांसद अमृतपाल सिंह संसद के शीतकालीन सत्र में हिस्सा ले पाएंगे या नहीं। यह फैसला न केवल राजनीतिक बल्कि संवैधानिक दृष्टि से भी दूरगामी असर डाल सकता है।


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