महाराष्ट्र में महायुति में बढ़ी तनातनी – चुनावी मंच पर सहयोगी ही बने एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी
महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों माहौल बेहद गर्म है। महायुति का हिस्सा होते हुए भी अहम नेता चुनावी मंचों पर एक-दूसरे पर निशाना साधने से नहीं चूक रहे। सहयोगियों के बीच यह टकराव अब गठबंधन की मजबूती और आगामी चुनावों की रणनीति पर सवाल खड़े कर रहा है।
चुनावी मंच पर खुलकर भिड़ंत
गठबंधन साथी, लेकिन भाषणों में प्रतिद्वंद्वी
महाराष्ट्र में महायुति के दो प्रमुख नेता अब जनसभाओं में ही एक दूसरे के खिलाफ तीखे तंज कसते दिखाई देने लगे हैं। एक ही मंच से जनता को संदेश देने के बजाय, वे एक-दूसरे की रणनीतियों और बयानों को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं।
दरार का बढ़ता असर
पोस्टर-वार से लेकर बयानबाज़ी तक तकरार तेज
गत कुछ दिनों में दोनों नेताओं की ओर से दिए गए बयानों ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है। रैलियों में नाराजगी भरे इशारे, सोशल मीडिया पर टीस भरी टिप्णियां और कार्यकर्ताओं में पसरी बेचैनी गठबंधन की स्थिति पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है।
महायुति की राजनीतिक मजबूरी
साथ रहने की कोशिश, पर तालमेल की कमी
हालांकि दोनों नेता महायुति के भीतर एकजुटता का संदेश देने का दावा करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर तालमेल की कमी साफ झलक रही है। जानकार मानते हैं कि सीट शेयरिंग, नेतृत्व की पकड़ और क्षेत्रीय वर्चस्व जैसे मुद्दों पर यह टकराव और तीखा हो सकता है।
विपक्ष को मिला बड़ा मौका
गठबंधन की कलह पर विपक्ष की नजर
महा विकास अघाड़ी समेत विपक्षी दलों ने इस पूरे घटनाक्रम को अपने लिए बड़ा राजनीतिक हथियार बना लिया है। विपक्ष लगातार यह सवाल उठा रहा है कि जब सहयोगी नेता ही एक-दूसरे से संतुष्ट नहीं, तो जनता उनके वादों पर कैसे भरोसा करे?
चुनाव से पहले बढ़ेगी महायुति की परीक्षा
आंतरिक संघर्ष बनेगा रणनीति का सबसे बड़ा संकट
विश्लेषकों की मानें तो यह तकरार सिर्फ चुनावी बयानबाजी नहीं, बल्कि अंदरूनी असंतोष का संकेत भी है। अगर यही माहौल जारी रहा, तो चुनावी गणित, वोट ट्रांसफर और संयुक्त रैलियों पर इसका सीधा असर पड़ेगा। गठबंधन को चुनाव से पहले अपने भीतर की खाइयों को पाटना ही होगा।