युवा नेतृत्व की जंग: तीन दावों में एक ही कर पाया कमाल ,बिहारी फर्स्ट..
बिहार विधानसभा चुनाव ने यह साफ कर दिया कि युवाओं के नाम पर चलाए गए तीन अलग—अलग राजनीतिक प्रयोगों में जनता ने सिर्फ एक पर भरोसा जताया—चिराग पासवान। तेजस्वी यादव की उम्मीदें और प्रशांत किशोर की बड़े-बड़े दावों वाली राजनीति जहाँ उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी, वहीं चिराग का ‘बिहारी फर्स्ट’ एजेंडा और उनकी जमीनी रणनीति एनडीए के लिए ‘गेम चेंजर’ साबित हुई।
चिराग का उदय: ‘बिहारी फर्स्ट’ ने पकड़ी चुनावी हवा
एनडीए के सभी दलों का प्रदर्शन अच्छा रहा, लेकिन सबसे तेज़ उभार चिराग पासवान का रहा। खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का “हनुमान” बताने वाले चिराग इस बार गठबंधन के एक्स-फैक्टर के रूप में उभरे। उनकी पार्टी लोजपा (राम विलास) को मिली 29 सीटों में से 19 पर जीत लगभग सुनिश्चित हो गई।
युवा मतदाताओं को जोड़ने के लिए उनका “बिहारी फर्स्ट” नारा कारगर रहा। कोर वोट की मजबूती के साथ पीएम मोदी की लोकप्रियता का लाभ भी उन्हें मिला। टिकट वितरण में जातीय समीकरणों तक सीमित न रहकर उन्होंने अगड़ी जाति, ईबीसी और महिलाओं को भी बड़ी संख्या में मौका दिया। पिछली बार के “बागी नेता” की जगह इस बार वे ‘युवा बिहारी चेहरा’ बनकर उभरे।
बदलाव का आधार: जहां भाजपा हारती रही, वहां भी लोजपा ने पलटे समीकरण
चिराग को जिन सीटों पर लड़ने का मौका मिला, उनमें कई वे रहीं जहां एनडीए वर्षों से कमजोर था। लेकिन इस चुनाव में समीकरण पूरी तरह बदल गए।
– सिमरी बख्तियारपुर, जहाँ पिछली बार आरजेडी मजबूत थी, इस बार एनडीए की राह आसान हुई।
– दरौली, जो 2005 से वाम दलों का गढ़ रही, वहाँ भी लोजपा ने मुकाबला दिलचस्प बना दिया।
– बेलसंड, बहादुरगंज और कसबा जैसी सीटें, जहाँ कई बार एनडीए को सफलता नहीं मिली थी, उनमें लोजपा की युवा टीम ने वोटर्स को प्रभावित किया।
चिराग को पासवान समाज और ईबीसी वोटरों का मजबूत आधार तो मिला ही, लेकिन नतीजों ने यह भी दिखाया कि उनकी पहुंच अब सिर्फ दलित वोट तक सीमित नहीं रही—वे बहुस्तरीय समर्थन जुटाने वाले नेता के रूप में उभर रहे हैं।
गठबंधन की मजबूती: बागी से ‘मुख्य स्तंभ’ तक का सफर
2020 में सीट बंटवारे के विवाद के कारण एनडीए से अलग होकर 130 से ज्यादा सीटों पर लड़ने वाली लोजपा तब सिर्फ एक सीट जीत पाई थी।
लेकिन 2025 में हालात पूरी तरह बदल गए—अब लोजपा (राम विलास) एनडीए का मजबूत स्तंभ बनकर सामने आई है।
चिराग ने यह साबित कर दिया कि राजनीतिक रणनीति, नेतृत्व क्षमता और सही समय पर लिए गए फैसले किसी क्षेत्रीय पार्टी को भी राष्ट्रीय गठबंधन में महत्वपूर्ण स्थान दिला सकते हैं।
तेजस्वी और प्रशांत किशोर: उम्मीदों का ग्राफ क्यों गिरा
तेजस्वी यादव ने रोजगार और वादों पर फोकस किया, लेकिन अपेक्षित जनसमर्थन नहीं जुटा पाए।
वहीं प्रशांत किशोर का जन सुराज अभियान, व्यापक यात्राओं और बड़े दावों के बावजूद, सीटों में तब्दील नहीं हो सका।
पीके की पार्टी सभी 243 सीटों पर उतरी, मगर कोई सफलता नहीं मिली। युवाओं को लुभाने का दावा भी जमीन पर नहीं उतर पाया।
इसके विपरीत चिराग ने कम बोलकर, सीमित सीटों पर लड़कर और केंद्र—राज्य की उपलब्धियों पर वोट मांगकर चुनाव को ज्यादा व्यावहारिक और प्रभावी तरीके से लड़ा।
आगे की राजनीति: बिहार में चिराग की पकड़ और मजबूत होगी
सियासी जानकारों का मानना है कि इस चुनाव ने चिराग पासवान को एक मजबूत राजनीतिक भविष्य की ओर धकेला है।
– वे युवा हैं,
– उनके पास जातीय आधार है,
– गठबंधन में उनकी स्वीकार्यता बढ़ रही है,
– और युवा मतदाता उन्हें नए दौर के नेता के रूप में देख रहा है।
बिहार की राजनीति अब भी पुराने नेताओं के हाथ में है, ऐसे में एक युवा चेहरा आगे आने वाले समय में प्रदेश की दिशा और स्वरूप को प्रभावित कर सकता है।
तीन युवा दावेदार, पर असली करिश्मा चिराग का
तीन अलग-अलग युवा चेहरों ने बदलाव का दावा किया, पर जनता ने सिर्फ एक पर विश्वास जताया।
चिराग पासवान ने यह साबित कर दिया कि अगर विचार साफ हों, रणनीति सटीक हो और नेतृत्व में आत्मविश्वास हो तो छोटे राजनीतिक आंकड़े भी बड़े नतीजे बदल सकते हैं।