भीड़ से वोट तक सफर अधूरा: प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी क्यों नहीं चली ?
बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बड़ी तैयारियों, चर्चा और जनसभाओं की भारी भीड़ के बावजूद एक भी सीट नहीं जीती। पूरे राज्य में यात्रा और आक्रामक प्रचार अभियान के बाद भी पीके का राजनीतिक प्रयोग अंतिम नतीजों में बदल नहीं पाया। आखिर इतने शोर-शराबे और उम्मीदों के बाद भी जन सुराज जमीन पर क्यों नहीं टिक पाया? आइए विश्लेषण करते हैं—ताज़ा अपडेट्स और नए समीकरणों के साथ।
जनसभाओं की भीड़ वोट में क्यों नहीं बदली?
प्रशांत किशोर की सभाओं में भीड़ और उत्साह जरूर दिखा, लेकिन यह समर्थन वोटिंग मशीन तक नहीं पहुंच पाया। विशेषज्ञों के अनुसार, जन सुराज का संगठन अभी इतना मजबूत नहीं था कि भीड़ को बूथ तक लाकर ठोस वोट में बदल सके। राजनीतिक जमीन पर भीड़ और वोट की मानसिकता में बड़ा अंतर दिखाई दिया।
पीके का ‘बड़ा दावा’ उलटा पड़ा
चुनावी प्रचार के दौरान पीके ने कहा था कि यदि जदयू 25 से अधिक सीटें जीत गई तो वे राजनीति छोड़ देंगे। यह बयान बाद में उनके खिलाफ जाता दिखा। विपक्षी दलों ने इसे प्रचार में हथियार की तरह इस्तेमाल किया और यह दावा प्रगतिशील राजनीति के बजाय ‘अति-आत्मविश्वास’ के रूप में पेश हुआ।
टिकट चयन पर उठे सवाल, विश्वसनीयता कमजोर हुई
जन सुराज शुरुआत से दावा करता रहा कि वह स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों को टिकट देगा, लेकिन पार्टी के 231 में से 108 प्रत्याशियों पर आपराधिक मामले दर्ज पाए गए। इससे पीके की ‘नए विकल्प’ वाली छवि को बड़ा झटका लगा और युवा व शहरी वोटर भी पूरी तरह कनेक्ट नहीं हो पाए।
जातीय समीकरणों में पिछड़ गई जन सुराज
बिहार की राजनीति में जातीय गणित अब भी सबसे निर्णायक फैक्टर है। पीके इसे बदलने की बात करते रहे, लेकिन चुनावी रणनीति जातीय संतुलन नहीं साध पाई। प्रमुख जातीय समूहों में से कोई भी समुदाय पूरी तरह उनके साथ नहीं आया।
सोशल मीडिया रणनीति मजबूत, लेकिन जमीनी ढांचा कमजोर
चुनाव में जन सुराज ने सोशल मीडिया, यूट्यूब और इन्फ्लुएंसर्स के सहारे प्रचार किया, लेकिन यह ऑनलाइन लहर वोटों में परिवर्तित नहीं हो सकी। स्वयं प्रशांत किशोर चुनाव नहीं लड़ रहे थे, जिससे कार्यकर्ताओं में भी अंतिम समय तक वैसी ‘ऊर्जा’ नहीं दिखी जैसी पारंपरिक पार्टियों में होती है।
प्रशांत किशोर ने बिहार में तीसरे विकल्प का सपना जरूर दिखाया, लेकिन संगठनात्मक कमी, टिकट वितरण विवाद, जातीय संतुलन और राजनीतिक अनुभव की कमी मतदान परिणामों में साफ दिखी। पीके का मॉडल चर्चा तो बना, लेकिन बड़ी राजनीतिक सफलता के लिए उन्हें अभी लंबी यात्रा तय करनी होगी।