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पतंजलि के च्यवनप्राश विज्ञापन पर दिल्ली हाईकोर्ट की सख्ती72 घंटे में विज्ञापन हटाने का आदेश, डाबर की शिकायत पर कार्रवाई…

दिल्ली हाईकोर्ट ने पतंजलि आयुर्वेद को बड़ा झटका देते हुए उसके स्पेशल च्यवनप्राश विज्ञापन को 72 घंटे के भीतर सभी प्लेटफॉर्म से हटाने का आदेश दिया है। अदालत ने यह अंतरिम आदेश डाबर इंडिया की शिकायत पर दिया, जिसमें पतंजलि पर अन्य ब्रांड्स को ‘धोखेबाज’ बताने का आरोप लगाया गया था।

डाबर की शिकायत के बाद कोर्ट की सख्ती

डाबर इंडिया ने कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि पतंजलि के विज्ञापन में जानबूझकर उनके उत्पादों की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई है। कंपनी का कहना था कि विज्ञापन में पतंजलि ने प्रतिस्पर्धी ब्रांड्स को “धोखा देने वाला” बताया, जिससे उपभोक्ताओं में गलत संदेश गया।

जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने दिया अंतरिम आदेश

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने 6 नवंबर को अंतरिम आदेश जारी किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी कंपनी अपने उत्पादों के प्रचार में प्रतिस्पर्धियों को नीचा दिखाने या भ्रामक दावे करने का अधिकार नहीं रखती। अदालत ने पतंजलि को निर्देश दिया कि वह 72 घंटे के भीतर इस विज्ञापन को सभी मीडिया प्लेटफॉर्म से हटा ले।

विज्ञापन में ‘भ्रामक दावे’ पर उठे सवाल

डाबर ने कोर्ट को बताया कि पतंजलि का यह विज्ञापन “तुलनात्मक विज्ञापन” के दायरे में नहीं आता, बल्कि यह प्रतिस्पर्धी उत्पादों की साख को नुकसान पहुंचाने वाला है। विज्ञापन में यह दिखाया गया था कि अन्य ब्रांड्स के च्यवनप्राश “केवल दिखावा” करते हैं, जबकि पतंजलि का उत्पाद “असली आयुर्वेदिक” है।

पतंजलि की दलील और अगली सुनवाई

पतंजलि की ओर से कहा गया कि विज्ञापन का उद्देश्य केवल अपने उत्पाद की खूबियां बताना था, किसी ब्रांड को निशाना बनाना नहीं। हालांकि अदालत ने कहा कि इस तर्क की सत्यता पर आगे सुनवाई में विचार किया जाएगा। अगली सुनवाई की तारीख जल्द तय की जाएगी।

ब्रांड वॉर में नैतिक विज्ञापन की जरूरत

यह मामला सिर्फ पतंजलि बनाम डाबर का नहीं, बल्कि भारतीय विज्ञापन उद्योग में बढ़ती प्रतिस्पर्धा की सीमा रेखा को दिखाता है। अदालत का यह फैसला एक अहम नज़ीर बन सकता है, जो बताता है कि प्रचार की आज़ादी के साथ “नैतिक जिम्मेदारी” भी जुड़ी होती है। कंपनियों को उपभोक्ताओं का भरोसा जीतने के लिए ईमानदार और पारदर्शी विज्ञापन नीति अपनानी होगी।

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