सीकर के बाय गांव में दशहरे पर नहीं जलता रावण का पुतला, 173 साल से रणभूमि में होता है वध
राजस्थान के सीकर जिले के बाय गांव में दशहरा मनाने की परंपरा अनोखी है। यहां रावण का पुतला जलाने के बजाय राम और रावण की सेनाओं के बीच युद्ध का मंचन किया जाता है। करीब 173 साल से चली आ रही इस परंपरा में गांव के लोग ही रामायण के पात्रों की भूमिका निभाते हैं। युद्ध के बाद रणभूमि में रावण वध होता है। रात में देवस्वरूपों की झांकियां, नृसिंह लीला और लोकदेवताओं की प्रस्तुतियां भी आयोजन का हिस्सा बनती हैं।
173 साल पुरानी है बाय गांव की दशहरे की परंपरा
सीकर जिले के बाय गांव में दशहरा पारंपरिक पुतला दहन से अलग अंदाज में मनाया जाता है। यहां रामायण के युद्धकांड का सजीव मंचन होता है। इस दौरान गांव का माहौल अयोध्या और लंका जैसा नजर आता है।गांव के लोग ही श्रीराम, लक्ष्मण, हनुमान, वानर सेना और रावण की सेना के पात्र निभाते हैं। सभी कलाकार अपने किरदारों के जरिए रामायण के प्रसंगों को जीवंत करते हैं। अंत में दोनों सेनाओं के बीच युद्ध होता है और रणभूमि में रावण वध किया जाता है।करीब 173 साल से चली आ रही यह परंपरा गांव की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। इसमें स्थानीय लोग मिलकर भाग लेते हैं और पुरानी परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
पुतला दहन के बजाय होता है राम-रावण की सेनाओं का युद्ध
बाय गांव के दशहरे की सबसे खास बात यह है कि यहां रावण का पुतला जलाने के बजाय राम और रावण की सेनाओं के बीच युद्ध का मंचन किया जाता है। राजकीय आदर्श विद्यालय का मैदान इस दौरान रणभूमि में बदल जाता है।युद्ध के दृश्यों में ग्रामीण अलग-अलग पात्रों की भूमिका निभाते हैं। मंचन के अंत में रावण का वध किया जाता है। इस तरह दर्शक रामायण के प्रसंगों को केवल मंच पर नहीं, बल्कि मैदान में प्रस्तुत युद्ध के रूप में देखते हैं।यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ लोकनाट्य और सामूहिक भागीदारी का उदाहरण भी है। गांव के कलाकारों और आयोजकों की मेहनत से यह परंपरा लंबे समय से जारी है।
दशहरा गांव के लोगों के लिए भाईचारे का उत्सव
बाय गांव का दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता का अवसर भी है। इस महोत्सव में भाग लेने के लिए मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पंजाब और विदेशों में रहने वाले प्रवासी परिवार भी गांव लौटते हैं।दूर-दराज के शहरों में रहने वाले लोगों के लिए यह आयोजन अपने गांव और परंपराओं से जुड़ने का अवसर बनता है। परिवार और रिश्तेदार एक साथ जुटते हैं और दशहरे के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं।इससे नई पीढ़ी को भी गांव की सांस्कृतिक विरासत के बारे में जानने का मौका मिलता है। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा स्थानीय पहचान और आपसी भाईचारे को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
रावण वध के बाद श्रीराम को ले जाया जाता है लक्ष्मीनाथ मंदिर
रणभूमि में रावण वध के बाद श्रीराम को रथ पर विराजमान किया जाता है। इसके बाद गाजे-बाजे के साथ उन्हें लक्ष्मीनाथ मंदिर ले जाया जाता है।मंदिर में आराधना के बाद महाआरती होती है। इस दौरान श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं और धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। इस तरह युद्ध के मंचन के साथ दशहरे का धार्मिक पक्ष भी परंपरागत रूप से निभाया जाता है।
रात में निकलती हैं देवस्वरूपों और लोकदेवताओं की झांकियां
बाय गांव में दशहरे का कार्यक्रम रावण वध के बाद भी जारी रहता है। रात में नृसिंह लीला का आयोजन किया जाता है। इसके साथ भगवान के 24 अवतारों और रामदेवजी, गोगाजी तथा भैरूजी सहित विभिन्न लोकदेवताओं की झांकियां निकाली जाती हैं।कलाकार अलग-अलग मुखौटे पहनकर नगाड़ों की थाप पर प्रस्तुतियां देते हैं। इन झांकियों में धार्मिक मान्यताओं और राजस्थान की लोक संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।रात के इन कार्यक्रमों में गांव के लोग और बाहर से आए प्रवासी परिवार भी शामिल होते हैं। इससे दशहरे का आयोजन पूरे गांव का सामूहिक उत्सव बन जाता है।
बाय गांव की परंपरा बनी सांस्कृतिक पहचान
बाय गांव में 173 साल से निभाई जा रही दशहरे की परंपरा राजस्थान की लोक-सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती है। यहां पुतला दहन के बजाय राम-रावण युद्ध और रणभूमि में रावण वध को केंद्र में रखा गया है।गांव के लोगों की भागीदारी, प्रवासी परिवारों की मौजूदगी और रात में होने वाले धार्मिक कार्यक्रम इस आयोजन को खास बनाते हैं। यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों को रामायण के प्रसंगों से जोड़ने के साथ गांव की सांस्कृतिक पहचान को भी आगे बढ़ाती है।