राजस्थान के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील संकट, बच्चों के भोजन पर असर; गहलोत ने सरकार को घेरा
राजस्थान के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील योजना के संचालन को लेकर संकट सामने आया है। सीकर जिले के करीब 40 प्रतिशत स्कूलों में खाद्यान्न और कन्वर्जन राशि की कमी से बच्चों के दोपहर के भोजन पर असर पड़ने की जानकारी है। कई विद्यालयों में राशन सितंबर तक ही उपलब्ध कराया गया था। वहीं, पन्नाधाय बाल गोपाल योजना के तहत दूध वितरण भी प्रभावित होने की आशंका है। दूसरी ओर, कुक-कम-हेल्पर का मानदेय आठ महीने से बकाया बताया जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार से जवाब मांगा है।
सीकर के करीब 40 प्रतिशत स्कूलों में मिड-डे मील का संकट
सीकर जिले के सरकारी स्कूलों में बच्चों को मिलने वाले दोपहर के भोजन की व्यवस्था प्रभावित होने की बात सामने आई है। जानकारी के अनुसार, जिले के करीब 40 प्रतिशत स्कूलों में मिड-डे मील का खाद्यान्न खत्म हो गया है या इसकी व्यवस्था संकट में है।कई विद्यालयों को खाद्यान्न सितंबर तक ही मिला था। वहीं, बच्चों के भोजन के लिए सब्जी, मसाले और अन्य सामग्री खरीदने की कन्वर्जन राशि भी समय पर नहीं पहुंची। कुछ स्कूलों में यह राशि अप्रैल तक, जबकि कुछ में जून-जुलाई तक ही मिली।बढ़े हुए नामांकन के कारण कई विद्यालयों में उपलब्ध राशन सितंबर तक भी नहीं चल पाया। ऐसे में स्कूलों के सामने बच्चों के लिए नियमित भोजन तैयार करना चुनौती बन गया है।
शिक्षकों और भामाशाहों ने अपने स्तर पर संभाली व्यवस्था
खाद्यान्न की कमी होने पर कुछ स्कूलों ने दूसरे विद्यालयों से राशन लेकर काम चलाया। वहीं, शिक्षकों और भामाशाहों ने भी अपने स्तर पर आर्थिक सहयोग किया।हालांकि, यह वैकल्पिक व्यवस्था लंबे समय तक जारी रखना मुश्किल हो रहा है। खाद्यान्न और कन्वर्जन राशि की नियमित आपूर्ति नहीं होने से स्कूलों पर दबाव बढ़ गया है।शिक्षक संगठनों ने सरकार से जल्द पोषाहार की व्यवस्था बहाल करने की मांग की है। उनका कहना है कि बच्चों को नियमित भोजन उपलब्ध कराना जरूरी है। इसमें देरी होने पर विद्यार्थियों की उपस्थिति और नामांकन पर भी असर पड़ सकता है।
पन्नाधाय बाल गोपाल योजना के दूध वितरण पर भी असर
मिड-डे मील के साथ स्कूलों में बच्चों को दूध उपलब्ध कराने वाली पन्नाधाय बाल गोपाल योजना को लेकर भी चिंता सामने आई है।जानकारी के अनुसार, स्कूलों को दूध पाउडर भी सितंबर महीने तक का ही उपलब्ध कराया गया था। ऐसे में आगे दूध वितरण जारी रखने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।स्कूलों में पोषण संबंधी योजनाएं बच्चों के स्वास्थ्य और नियमित उपस्थिति से जुड़ी हैं। इसलिए खाद्यान्न, कन्वर्जन राशि और दूध की समय पर उपलब्धता जरूरी है। हालांकि, जिले के सभी स्कूलों में दूध वितरण बंद होने की पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती।
अशोक गहलोत ने सरकार पर साधा निशाना
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने दावा किया कि सीकर के करीब 40 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील का राशन खत्म हो गया है।गहलोत ने कहा कि खाद्यान्न और राशि नहीं मिलने के कारण शिक्षक तथा भामाशाह अपनी जेब से बच्चों के भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि रसोइयों को आठ महीने से मानदेय नहीं मिला है।गहलोत ने राज्य सरकार से सवाल किया कि विज्ञापनों पर खर्च के लिए बजट उपलब्ध है, लेकिन बच्चों के भोजन और रसोइयों के मानदेय के लिए धन क्यों नहीं दिया जा रहा। उन्होंने मुख्यमंत्री से इस मामले में जवाब देने की मांग की।
आठ महीने से मानदेय नहीं मिलने से कुक-कम-हेल्पर परेशान
स्कूलों में भोजन तैयार करने वाली कुक-कम-हेल्पर को भी आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जानकारी के अनुसार, कई कर्मचारियों का मानदेय आठ महीने से बकाया है।इनमें कई महिलाएं विधवा और तलाकशुदा भी हैं। परिवार की जिम्मेदारियां होने के कारण मानदेय में देरी से उनके घरेलू खर्च पर असर पड़ रहा है।शिक्षक संगठनों का कहना है कि सरकार को बच्चों के पोषण के साथ भोजन तैयार करने वाले कर्मचारियों के भुगतान पर भी ध्यान देना चाहिए। समय पर मानदेय मिलने से कर्मचारियों को राहत मिल सकती है और स्कूलों में भोजन व्यवस्था सुचारु रखने में मदद मिलेगी।
शिक्षक संघ ने जताई चिंता, अधिकारियों ने दिया आश्वासन
राजस्थान शिक्षक संघ के सीकर जिलाध्यक्ष विनोद पूनिया के अनुसार, खाद्यान्न और कन्वर्जन राशि नहीं मिलने से जिले के सैकड़ों स्कूलों में पोषाहार व्यवस्था प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि मानदेय बकाया होने से कुक-कम-हेल्पर भी आर्थिक संकट का सामना कर रही हैं।वहीं, सीकर की कार्यवाहक मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी किरण सैनी ने बताया कि स्कूलों में मिड-डे मील की समस्या दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस संबंध में बैठक भी आयोजित की जा रही है। उन्होंने जल्द परेशानी दूर होने की उम्मीद जताई।
बच्चों के पोषण और स्कूलों में उपस्थिति पर असर की आशंका
मिड-डे मील योजना का उद्देश्य सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना है। यदि खाद्यान्न और बजट की कमी लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर योजना के संचालन पर पड़ सकता है।शिक्षक संगठनों ने चेताया है कि भोजन की नियमित व्यवस्था बाधित होने से बच्चों की उपस्थिति और नामांकन भी प्रभावित हो सकते हैं। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि सरकार लंबित राशि जारी करने और खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाती है।