राजस्थान के ‘खेजड़ी’ का खुलेगा राज, MDSU में बन रहा खास रिसर्च सेंटर
राजस्थान के राज्य वृक्ष खेजड़ी के उत्पाद, उपयोगिता और संरक्षण को लेकर अब अजमेर के महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में शोध को बढ़ावा मिलेगा। विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग की ओर से कैंपस में एक लघु शोध केंद्र तैयार किया जा रहा है। यहां खेजड़ी से जुड़े उत्पादों की जानकारी उपलब्ध होगी। साथ ही विद्यार्थी, शिक्षक और शोधार्थी इसके औषधीय, पर्यावरणीय और उपयोगी पहलुओं पर अध्ययन कर सकेंगे। विश्वविद्यालय परिसर में पहले से खेजड़ी वाटिका विकसित की गई है, जिसमें करीब 100 पौधे लगाए गए हैं।
खेजड़ी को शोध के लिए क्यों चुना गया?
खेजड़ी को राजस्थान का राज्य वृक्ष माना जाता है। यह राजस्थान के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में व्यापक रूप से पाया जाता है।अजमेर के अलावा जोधपुर, बीकानेर, पाली, बाड़मेर, जैसलमेर, नागौर, सीकर और झुंझुनूं सहित कई जिलों में इसकी मौजूदगी है। रेगिस्तानी परिस्थितियों में यह वृक्ष पर्यावरणीय संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।इसकी पत्तियां पशुओं के चारे के रूप में उपयोग होती हैं। वहीं फलियों से सांगरी तैयार की जाती है। इसके अलावा पेड़ से जुड़े कई पारंपरिक उत्पाद और उपयोग भी हैं।
MDSU में तैयार हो रही खेजड़ी वाटिका
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय परिसर में महर्षि चरक भवन के पीछे खेजड़ी वाटिका विकसित की गई है। इसमें करीब 100 खेजड़ी के पौधे लगाए गए हैं।विश्वविद्यालय के अनुसार ये पौधे अब काफी विकसित हो चुके हैं। विभाग की ओर से परिसर की खाली जमीन पर आगे भी खेजड़ी के पौधे लगाए जाने की योजना है।इससे विश्वविद्यालय परिसर में खेजड़ी के संरक्षण के साथ विद्यार्थियों को अध्ययन के लिए प्राकृतिक प्रयोगशाला जैसा वातावरण मिल सकेगा।
खेजड़ी के उत्पादों की मिलेगी जानकारी
पर्यावरण विज्ञान विभाग में तैयार हो रहे लघु शोध केंद्र में खेजड़ी से जुड़े कई उत्पादों को प्रदर्शित किया जाएगा।केंद्र में खेजड़ी से मिलने वाले गोंद, केर-सांगरी की सब्जी और आचार, खोखा यानी सूखा फल और मींझर यानी फूल जैसी चीजों की जानकारी उपलब्ध होगी।इसके साथ ही खेजड़ी के संरक्षण और इसके ऐतिहासिक महत्व से जुड़ी जानकारी भी प्रदर्शित की जाएगी।
अमृता देवी के योगदान की भी मिलेगी जानकारी
खेजड़ी संरक्षण के इतिहास में अमृता देवी और उनके बलिदान का विशेष उल्लेख मिलता है। शोध केंद्र में खेजड़ी बचाने के उनके योगदान से जुड़ी जानकारी भी उपलब्ध कराने की योजना है।केंद्र में प्रोजेक्टर की सुविधा भी प्रस्तावित है। इसके माध्यम से विद्यार्थियों और शोधार्थियों को खेजड़ी के पर्यावरणीय महत्व और संरक्षण से जुड़े विषयों की जानकारी दी जा सकेगी।
कई विषयों के विद्यार्थी कर सकेंगे शोध
इस शोध केंद्र का उपयोग केवल पर्यावरण विज्ञान के विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहेगा।भूगोल, बॉटनी, पर्यावरण विज्ञान, माइक्रोबायोलॉजी और अन्य विषयों से जुड़े विद्यार्थी और शोधार्थी यहां अध्ययन कर सकेंगे। शिक्षक भी खेजड़ी से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर शोध और अकादमिक गतिविधियां कर सकेंगे।इससे खेजड़ी के जैव विविधता, पर्यावरण, खाद्य उपयोग और संरक्षण से जुड़े विषयों पर अध्ययन को बढ़ावा मिल सकता है।
मियावाकी पद्धति से लगाए गए पौधे
विश्वविद्यालय में खेजड़ी के पौधरोपण के लिए मियावाकी पद्धति का इस्तेमाल किया गया है। यह तकनीक छोटे क्षेत्र में स्थानीय प्रजातियों का घना पौधरोपण करने के लिए जानी जाती है।इस पद्धति का उद्देश्य कम जगह में घना और विविधतापूर्ण हरित क्षेत्र विकसित करना है। हालांकि पौधों की वृद्धि और जंगल के विकास की वास्तविक गति स्थानीय परिस्थितियों और देखभाल पर निर्भर करती है।
खेजड़ी के संरक्षण पर फोकस
विश्वविद्यालय का यह प्रयास खेजड़ी के संरक्षण और उसके उपयोग से जुड़ी जानकारी को एक जगह उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।राजस्थान में खेजड़ी का पर्यावरणीय और ग्रामीण जीवन से गहरा संबंध है। ऐसे में शोध केंद्र के जरिए नई पीढ़ी को इसके महत्व की जानकारी देने और शोध को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है।
फैक्ट फाइल
- 1983: खेजड़ी को राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया गया।
- 15 से अधिक जिले: राजस्थान के कई जिलों में खेजड़ी पाई जाती है।
- उत्पाद: सांगरी, गोंद, खोखा और मींझर सहित कई उपयोग।
- MDSU परिसर: करीब 100 खेजड़ी पौधों की वाटिका विकसित।
- शोध केंद्र: विद्यार्थी, शिक्षक और शोधार्थी अध्ययन कर सकेंगे।
- मुख्य फोकस: खेजड़ी की उपयोगिता, संरक्षण और पर्यावरणीय महत्व।
विश्वविद्यालय का कहना है…
पर्यावरण विज्ञान विभाग के अनुसार लघु शोध केंद्र तैयार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य खेजड़ी से जुड़ी जानकारी को एक स्थान पर उपलब्ध कराना और भविष्य में विद्यार्थियों व शोधार्थियों को शोध की सुविधा देना है। विश्वविद्यालय के इस प्रयास से खेजड़ी के संरक्षण, उपयोगिता और पर्यावरणीय महत्व को लेकर जागरूकता बढ़ाने की उम्मीद है।