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भर्तृहरि बाबा मेले में उमड़ा आस्था का सैलाब, अंतिम दिन दर्शन के लिए पहुंचे हजारों श्रद्धालु

अलवर के सरिस्का वन क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध भर्तृहरि धाम में चल रहे मेले के अंतिम दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से लोग ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और अन्य वाहनों से बाबा के दर्शन करने पहुंचे। श्रद्धालुओं ने मंदिर में माथा टेककर मनोकामनाएं मांगीं। कई भक्त दंडौती देते हुए धाम तक पहुंचे। पहाड़ियों और हरियाली के बीच स्थित भर्तृहरि धाम में धार्मिक आस्था के साथ ग्रामीण संस्कृति की भी झलक देखने को मिली। मेले में पारंपरिक देहाती सामान की खरीदारी के साथ लोकगीत और भर्तृहरि बाबा की अमर कथा का आयोजन भी आकर्षण का केंद्र रहा।

अंतिम दिन भर्तृहरि बाबा के दर्शन को उमड़ी भीड़

मेले के अंतिम दिन सुबह से ही भर्तृहरि धाम में श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। बड़ी संख्या में लोग परिवार के साथ बाबा के दर्शन के लिए पहुंचे।दूर-दराज के गांवों से आए श्रद्धालुओं ने बाबा के दरबार में पूजा-अर्चना की। लोगों ने अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मन्नतें मांगीं और धार्मिक अनुष्ठान किए।

दंडौती देते हुए धाम पहुंचे श्रद्धालु

भर्तृहरि बाबा के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई भक्त दंडौती देते हुए धाम तक पहुंचे।लोगों ने मंदिर में दर्शन करने के साथ आसपास की पहाड़ी जलधारा में भी स्नान किया। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार इस जल में स्नान करने से बीमारियों से राहत मिलती है। हालांकि, यह धार्मिक मान्यता है, इसका चिकित्सकीय प्रमाण अलग विषय है।

सरिस्का की हरियाली के बीच स्थित है भर्तृहरि धाम

भर्तृहरि धाम अलवर के सरिस्का वन क्षेत्र में पहाड़ियों और हरियाली के बीच स्थित है। प्राकृतिक वातावरण के साथ धार्मिक महत्व के कारण यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण रखता है।हर साल आयोजित होने वाले मेले में राजस्थान के अलग-अलग ग्रामीण क्षेत्रों से लोग पहुंचते हैं। कई श्रद्धालु ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और अन्य वाहनों से लंबी दूरी तय करके यहां आते हैं।

राजा से वैरागी बनने की मान्यता

धार्मिक मान्यता के अनुसार भर्तृहरि बाबा उज्जैन के राजा थे। बाद में उन्होंने राजपाट त्यागकर वैराग्य धारण किया और इस क्षेत्र में आकर तपस्या की।मान्यता है कि भर्तृहरि बाबा ने इसी क्षेत्र में साधना की और समाधि में लीन हुए। इसी धार्मिक आस्था के कारण भर्तृहरि धाम को जन-जन की श्रद्धा का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

‘लट्ठ मेला’ में देहाती सामान बना आकर्षण

भर्तृहरि बाबा के मेले को स्थानीय स्तर पर ‘लट्ठ मेला’ भी कहा जाता है। मेले में इस बार पारंपरिक ग्रामीण सामान की दुकानों पर भी लोगों की भीड़ दिखाई दी।मूसल, रही, चक्की, बेलन और उखल सहित लकड़ी से बने कई घरेलू सामान लोगों के आकर्षण का केंद्र रहे। ग्रामीणों ने अपनी जरूरत के अनुसार इन पारंपरिक सामानों की खरीदारी की।

लोकगीतों में सुनाई गई भर्तृहरि बाबा की कथा

मेले में जोगी समाज के लोगों ने भर्तृहरि बाबा से जुड़ी अमर कथा और लोकगीत प्रस्तुत किए। लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां सुनने के लिए भी मेला परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी।धार्मिक कथाओं और लोकगीतों के जरिए भर्तृहरि बाबा से जुड़ी लोक परंपराओं को लोगों तक पहुंचाया गया। इससे मेले में धार्मिक आस्था के साथ लोक संस्कृति की झलक भी देखने को मिली।

बुजुर्गों की मदद में जुटे स्काउट-गाइड स्वयंसेवक

मेले की व्यवस्थाओं में स्काउट-गाइड के स्वयंसेवकों ने भी सहयोग किया। स्वयंसेवक बुजुर्ग और जरूरतमंद श्रद्धालुओं को दर्शन कराने में मदद करते नजर आए।इसके अलावा प्रशासन और मेला समिति की ओर से सौंपे गए विभिन्न कार्यों में भी स्वयंसेवकों ने सहयोग किया। भीड़ के बीच श्रद्धालुओं की सुविधा को लेकर प्रशासन और पुलिस की टीमें भी सक्रिय रहीं।

प्रशासन और पुलिस ने संभाली व्यवस्था

अंतिम दिन श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने को देखते हुए प्रशासन और मेला समिति ने व्यवस्थाओं पर लगातार निगरानी रखी। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने भीड़ को नियंत्रित करने और यातायात व्यवस्था बनाए रखने के लिए इंतजाम किए।पूजा-अर्चना, लोकगीत, पारंपरिक सामान और ग्रामीण जीवन की झलक के साथ भर्तृहरि बाबा का मेला अंतिम दिन आस्था और लोक संस्कृति का संगम बना रहा।

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Stv News Rajasthan

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