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उदयपुर का 2000 साल पुराना पार्श्वनाथ जैन मंदिर, 108 तीर्थों में शामिल; पौष दशमी पर उमड़ते हैं श्रद्धालु

खबर का सारांश

उदयपुर के सवीना खेड़ा में स्थित श्री पार्श्वनाथ भगवान का प्राचीन जैन मंदिर धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से खास माना जाता है। मंदिर को राजस्थान के प्रमुख 108 जैन तीर्थों में शामिल बताया जाता है। इसकी स्थापत्य शैली और प्राचीन शिल्पकला श्रद्धालुओं के साथ इतिहास प्रेमियों को भी आकर्षित करती है।

मंदिर की प्राचीनता करीब 2000 वर्ष मानी जाती है। यहां काले पाषाण की भगवान पार्श्वनाथ की प्राचीन प्रतिमा विराजमान है। इसके अलावा मंदिर में कई अन्य तीर्थंकरों की प्रतिमाएं और ऐतिहासिक शिलालेख भी मौजूद हैं। पौष दशमी के अवसर पर यहां विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं।

शिखरबंद शैली में बना है प्राचीन मंदिर

सवीना खेड़ा का यह जैन मंदिर अपनी प्राचीन स्थापत्य शैली के लिए जाना जाता है। मंदिर का निर्माण शिखरबंद शैली में हुआ है। मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही इसकी स्थापत्य कला का प्रभाव दिखाई देता है।

प्रवेश द्वार के दोनों ओर पत्थरों पर हाथियों की आकृतियां उकेरी गई हैं। ये आकृतियां मंदिर की प्राचीन शिल्प परंपरा की झलक देती हैं। मंदिर परिसर में धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक महत्व भी दिखाई देता है। यही वजह है कि यहां श्रद्धालुओं के अलावा प्राचीन स्थापत्य में रुचि रखने वाले लोग भी पहुंचते हैं।

काले पाषाण की पार्श्वनाथ प्रतिमा है खास

मंदिर के निज मंदिर में भगवान पार्श्वनाथ की प्राचीन प्रतिमा विराजमान है। यह प्रतिमा काले पाषाण से निर्मित बताई जाती है। इसकी ऊंचाई करीब 19 इंच है। सर्प छत्र को शामिल करने पर इसकी ऊंचाई 21 इंच हो जाती है।

परिकर सहित प्रतिमा की कुल ऊंचाई करीब 41 इंच बताई गई है। पंचतीर्थी स्वरूप वाली इस प्रतिमा के प्रति श्रद्धालुओं में विशेष आस्था है। मंदिर के मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आकर्षण बनी हुई है।

धर्मनाथ स्वामी की प्रतिमा और प्राचीन शिलालेख

मंदिर में भगवान धर्मनाथ स्वामी की सफेद संगमरमर की प्रतिमा भी स्थापित है। प्रतिमा के नीचे विक्रम संवत 1699 का शिलालेख अंकित बताया गया है। यह शिलालेख मंदिर की ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

शिलालेख में तत्कालीन उपकेश वंश और प्रतिमा से जुड़े दानदाताओं का उल्लेख मिलने की जानकारी दी गई है। इससे मंदिर की धार्मिक परंपरा के साथ उस दौर के सामाजिक इतिहास की झलक भी मिलती है। सदियों पुराने इस शिलालेख को मंदिर की प्रमुख ऐतिहासिक धरोहरों में गिना जाता है।

मंदिर में अन्य प्राचीन प्रतिमाएं भी मौजूद

मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा के दाहिनी ओर सफेद पाषाण की एक अन्य तीर्थंकर प्रतिमा स्थापित है। इसकी ऊंचाई करीब 19 इंच बताई गई है। प्रतिमा पर पक्षी लांछन होने का उल्लेख मिलता है।

वहीं, सभा मंडप की आलियों में पार्श्वयक्ष और देवी पद्मावती की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। इन प्रतिमाओं के कारण मंदिर का धार्मिक और कलात्मक महत्व और बढ़ जाता है। परिसर में मौजूद अलग-अलग प्रतिमाएं जैन धर्म की प्राचीन मूर्तिकला की परंपरा को दर्शाती हैं।

पौष दशमी पर विशेष आयोजन

श्री जैन श्वेतांबर महासभा की ओर से इस तीर्थ का संरक्षण किया जाता है। श्रद्धालुओं के बीच मंदिर की मूलनायक प्रतिमा को लेकर विशेष धार्मिक मान्यता है। इसी कारण यहां वर्षभर श्रद्धालुओं का आना-जाना रहता है।

पौष दशमी के अवसर पर मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। धार्मिक आस्था के साथ मंदिर की प्राचीन विरासत भी लोगों के आकर्षण का प्रमुख कारण है।

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