खुद निरक्षर, कोई बेटा-बेटी नहीं, फिर भी शिक्षा के लिए दान किए 15 लाख; मांगीबाई अहीर की कहानी
चित्तौड़गढ़ जिले के राशमी क्षेत्र के देवीपुरा गांव की 80 वर्षीय मांगीबाई अहीर ने शिक्षा के लिए ऐसा उदाहरण पेश किया है, जिसकी चर्चा पूरे क्षेत्र में हो रही है। खुद निरक्षर और निःसंतान विधवा मांगीबाई ने अपनी जीवनभर की बचत में से 15 लाख रुपए विद्यालय विकास के लिए दान किए। उनका कहना है कि गांव के बच्चे अच्छी शिक्षा हासिल कर आगे बढ़ें, इससे बड़ी खुशी उनके लिए कुछ नहीं हो सकती। विद्यालय को मंदिर और बच्चों को भगवान मानने वाली मांगीबाई का यह समर्पण समाज के लिए प्रेरणा बन गया है।
खुद नहीं पढ़ सकीं, लेकिन बच्चों की शिक्षा को बनाया मिशन
देवीपुरा गांव की रहने वाली मांगीबाई अहीर ने खुद कभी स्कूल में पढ़ाई नहीं की। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनके मन में गांव के बच्चों की शिक्षा को लेकर गहरी चिंता और लगाव है।
मांगीबाई ने शिक्षा को सबसे बड़ी सेवा मानते हुए स्थानीय विद्यालय के विकास के लिए अपनी बचत का बड़ा हिस्सा दान करने का फैसला किया। उनके इस निर्णय ने यह संदेश दिया कि शिक्षा के महत्व को समझने के लिए खुद शिक्षित होना जरूरी नहीं है।
विद्यालय को मंदिर और बच्चों को भगवान मानती हैं मांगीबाई
मांगीबाई का मानना है कि विद्यालय समाज के निर्माण की जगह है। वह स्कूल को मंदिर और वहां पढ़ने वाले बच्चों को भगवान के समान मानती हैं।
उन्होंने विद्यालय में पानी की टंकी, एक अतिरिक्त कक्षा-कक्ष और सरस्वती मंदिर के निर्माण सहित अलग-अलग विकास कार्यों के लिए आर्थिक सहयोग दिया है।
वर्तमान में मांगीबाई अपने भतीजे देवीलाल अहीर के साथ रहती हैं। पहले वह धार्मिक कार्यों में भी दान करती रही हैं, लेकिन अब उन्होंने शिक्षा को ही सबसे बड़ी सेवा का माध्यम माना है।
‘बच्चे आगे बढ़ें, इससे बड़ी खुशी कुछ नहीं’
मांगीबाई का कहना है कि गांव के बच्चे अच्छी शिक्षा हासिल करें और जीवन में आगे बढ़ें, इससे बड़ी खुशी उनके लिए कुछ नहीं है।
उनका यह विचार उस समय और महत्वपूर्ण हो जाता है जब उन्होंने अपनी जरूरतों से आगे बढ़कर बच्चों के भविष्य को प्राथमिकता दी है। 15 लाख रुपए का सहयोग गांव के विद्यालय की बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा है।
जिला कलक्टर ने भामाशाहों को किया सम्मानित
मांगीबाई अहीर सहित शिक्षा के क्षेत्र में आर्थिक सहयोग करने वाले अन्य भामाशाहों को जिला स्तर पर सम्मानित किया गया। जिला कलक्टर डॉ. मंजू ने ऐसे लोगों के योगदान को समाज के लिए प्रेरणादायी बताया।
शिक्षा विभाग में भामाशाहों को प्रोत्साहित करने के लिए हर महीने आठ भामाशाहों के सम्मान की पहल भी शुरू की गई है। इसी क्रम में मंगलवार को समिति कक्ष में दानदाताओं को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।
ग्रामीणों की मांग पर स्कूल के लिए नए प्रस्ताव
कार्यक्रम के दौरान ग्रामीणों की ओर से विद्यालय से जुड़ी कुछ मांगें भी जिला प्रशासन के सामने रखी गईं। इसके बाद जिला कलक्टर ने खेल मैदान के लिए भूमि प्रबंधन, बालिका शौचालय और स्मार्ट बोर्ड जैसी सुविधाओं के प्रस्ताव सीएसआर के माध्यम से स्वीकृत कराने के निर्देश दिए।
इससे ग्रामीण क्षेत्र के स्कूल में विद्यार्थियों के लिए सुविधाएं बढ़ाने की दिशा में आगे काम होने की उम्मीद है।
डॉ. मुस्तफा ने भी शिक्षा के लिए दिए करीब 18 लाख
कार्यक्रम में शिक्षा के लिए सहयोग करने वाले अन्य भामाशाहों की कहानियां भी सामने आईं। भादसोड़ा के मूल निवासी और अमेरिका में रह रहे एनआरआई डॉ. मुस्तफा ने गांव के बच्चों को डिजिटल शिक्षा से जोड़ने के लिए करीब 18 लाख रुपए का सहयोग किया।
उनके सहयोग से कंप्यूटर लैब, शिक्षकों की व्यवस्था, इन्वर्टर और सीसीटीवी सहित कई सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। उन्होंने क्षेत्र के विद्यालयों के विकास के लिए विद्या क्रांति फाउंडेशन भी बनाया है।
मडावदा में हर घर ने स्कूल से जोड़ा रिश्ता
राउप्रावि मडावदा की स्कूल प्रबंधन समिति ने भी सामुदायिक भागीदारी का उदाहरण पेश किया। करीब 150 घरों वाले गांव के प्रत्येक परिवार को विद्यालय से जोड़ा गया और स्कूल के विकास के लिए लगभग 5 लाख रुपए जुटाए गए।
इस पहल से यह संदेश सामने आया कि स्कूल के विकास में केवल सरकार या एक व्यक्ति ही नहीं, बल्कि पूरा समुदाय भी अपनी भूमिका निभा सकता है।
इन भामाशाहों का भी हुआ सम्मान
कार्यक्रम में शिक्षा के लिए सहयोग करने वाले अन्य लोगों को भी सम्मानित किया गया। मोरवन के प्रकाश टेलर ने 1.50 लाख रुपए, डूंगला के सेवानिवृत्त व्याख्याता नरेश कुमार मालू ने 1.11 लाख रुपए, जाशमा के सम्पतलाल बोरदिया ने 1 लाख रुपए तथा सेवानिवृत्त अध्यापिका तुलसी जोशी और सुदरी के प्रहलाद जाट ने 51-51 हजार रुपए विद्यालय विकास के लिए दिए।
सभी सहयोगकर्ताओं को भामाशाह के रूप में सम्मानित किया गया।
मांगीबाई की कहानी दे रही बड़ा संदेश
मांगीबाई अहीर की कहानी सिर्फ 15 लाख रुपए के दान तक सीमित नहीं है। यह उस सोच की कहानी है जिसमें अपनी जिंदगी में शिक्षा का अवसर नहीं मिलने के बावजूद उन्होंने आने वाली पीढ़ी के लिए पढ़ाई के रास्ते आसान बनाने का फैसला किया।
गांव के बच्चों के भविष्य को अपनी प्राथमिकता मानकर किया गया उनका यह योगदान ग्रामीण शिक्षा के लिए सामुदायिक भागीदारी की एक मिसाल बनकर सामने आया है।