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ONOE पर चिदंबरम का बड़ा हमला, बोले- 2029 में साथ चुनाव संभव नहीं

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ यानी ONOE को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच सियासी टकराव लगातार तेज होता दिख रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने प्रस्तावित चुनावी व्यवस्था पर गंभीर संवैधानिक सवाल उठाए हैं। संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के सामने दिए अपने पक्ष का हवाला देते हुए चिदंबरम ने दावा किया कि 2029 में लोकसभा और सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराना संभव नहीं होगा। उन्होंने इसे संसदीय लोकतंत्र और संघीय ढांचे से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों का मामला बताया है। चिदंबरम के रुख से संकेत मिल रहे हैं कि विपक्ष इस मुद्दे को संसद के साथ देशभर में भी जोर-शोर से उठाने की तैयारी में है।

2029 में एक साथ चुनाव पर चिदंबरम ने उठाए सवाल

कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ प्रस्ताव को लेकर विपक्ष की आपत्ति सामने रखी है। उनका कहना है कि संबंधित विधेयक संसद से पारित हो जाने की स्थिति में भी 2029 में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होगा। चिदंबरम ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बताया कि उन्होंने ONOE से जुड़े प्रस्ताव की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष अपना पक्ष रखा है। उनके मुताबिक, उनकी मुख्य आपत्ति इस बात को लेकर है कि प्रस्तावित व्यवस्था संविधान के मूल ढांचे से जुड़े सिद्धांतों को प्रभावित कर सकती है।

JPC के सामने संविधान की मूल संरचना का मुद्दा

चिदंबरम ने ONOE पर अपनी दलील को केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे संवैधानिक सवाल बताया है। उनका कहना है कि चुनावी व्यवस्था में इस तरह का व्यापक बदलाव संविधान की मूल संरचना से जुड़े सिद्धांतों के संदर्भ में परखा जाना चाहिए। संयुक्त संसदीय समिति इस प्रस्ताव से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रही है। ऐसे में चिदंबरम का पक्ष समिति की बहस में विपक्ष की संवैधानिक आपत्तियों को सामने रखता है। हालांकि, प्रस्ताव के अंतिम स्वरूप और इसके लागू होने की समयसीमा को लेकर अभी संसदीय प्रक्रिया जारी है।

संसदीय लोकतंत्र और संघीय ढांचे पर भी चिंता

कांग्रेस नेता का तर्क है कि भारत की शासन व्यवस्था में केंद्र और राज्यों की विधानसभाओं की अपनी-अपनी लोकतांत्रिक भूमिका है। उनके अनुसार, लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक ही चुनावी चक्र में बांधने से केंद्र और राज्यों के बीच मौजूद संवैधानिक संतुलन पर असर पड़ सकता है। चिदंबरम ने इसी संदर्भ में संसदीय लोकतंत्र और संघीय व्यवस्था का मुद्दा उठाया है। विपक्ष लंबे समय से यह सवाल करता रहा है कि अगर किसी राज्य की विधानसभा समय से पहले भंग हो जाती है या किसी सरकार का कार्यकाल किसी कारण से प्रभावित होता है तो एक साथ चुनाव की व्यवस्था को किस तरह लागू किया जाएगा।

चुनाव टलने की स्थिति भी बनी बड़ा सवाल

ONOE की व्यवस्था में चुनावों के एक साथ होने के कारण किसी राज्य में विधानसभा का कार्यकाल समय से पहले खत्म होने जैसी परिस्थितियां महत्वपूर्ण हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में चुनाव तुरंत कराए जाएंगे या निर्धारित चुनावी चक्र तक इंतजार किया जाएगा, यह बड़ा संवैधानिक और व्यावहारिक सवाल है। संसदीय समिति की चर्चाओं में भी चुनाव टालने की परिस्थितियों और उनकी संभावित समयसीमा जैसे मुद्दों पर विचार सामने आया है। यही वजह है कि ONOE को केवल चुनाव की तारीखों को एक करने की योजना के बजाय संवैधानिक, प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभावों से जुड़ा व्यापक प्रस्ताव माना जा रहा है।

विपक्ष देशभर में उठाएगा ONOE का मुद्दा

चिदंबरम के बयान के बाद ONOE पर विपक्षी दलों की रणनीति को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। विपक्ष इस प्रस्ताव को संसद के भीतर उठाने के साथ ही जनता के बीच ले जाने की तैयारी में दिखाई दे रहा है। कांग्रेस सहित विपक्षी दल इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था और राज्यों के अधिकारों से जोड़कर सवाल उठा रहे हैं। दूसरी ओर, सरकार और ONOE के समर्थकों की ओर से इसे चुनावी खर्च, प्रशासनिक संसाधनों और बार-बार होने वाली चुनावी प्रक्रिया को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण सुधार के तौर पर पेश किया जाता रहा है।

ONOE पर आगे बढ़ेगी संसद की प्रक्रिया

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़े प्रस्ताव पर अंतिम फैसला अभी संसदीय प्रक्रिया के अगले चरणों पर निर्भर करेगा। संयुक्त संसदीय समिति की चर्चाओं के बाद रिपोर्ट और उसके आधार पर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। प्रस्ताव के समर्थक और विरोधी दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ मैदान में हैं। ऐसे में ONOE आने वाले समय में संसद के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति का भी बड़ा मुद्दा बन सकता है। खासकर 2029 के चुनावों को लेकर चिदंबरम के बयान ने इस बहस को और अधिक राजनीतिक महत्व दे दिया है।

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