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Satluj विवाद के बीच CBFC सदस्य ने बताया, कैसे मिलता है फिल्म को सर्टिफिकेट, क्या हैं बोर्ड के नियम?

पंजाबी फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर जारी विवाद के बीच केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) की सर्टिफिकेशन प्रक्रिया फिर चर्चा में है। सेंसर बोर्ड के सदस्य राज मिश्रा ने स्पष्ट किया कि किसी भी फिल्म को प्रमाणपत्र देने से पहले उसकी विषयवस्तु, हिंसा, सामाजिक प्रभाव और देशविरोधी सामग्री समेत कई पहलुओं की गहन समीक्षा की जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि बोर्ड राजनीतिक दबाव में नहीं, बल्कि तय नियमों और कानूनी प्रक्रिया के तहत फैसले लेता है।

बिना CBFC सर्टिफिकेट रिलीज नहीं हो सकती फिल्म

‘सतलुज’ फिल्म को लेकर उठे विवाद के बीच सेंसर बोर्ड के सदस्य राज मिश्रा ने फिल्म प्रमाणन की प्रक्रिया को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि भारत में किसी भी फिल्म को थिएटर या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज करने से पहले CBFC का प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य है। बिना प्रमाणन के फिल्म का प्रदर्शन कानून का उल्लंघन माना जाता है। उन्होंने बताया कि बोर्ड के अध्यक्ष की नियुक्ति सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय करता है और वर्तमान में यह जिम्मेदारी प्रसून जोशी के पास है। हर फिल्म की समीक्षा पांच सदस्यीय समिति करती है और कम से कम तीन सदस्यों की सहमति मिलने पर ही प्रमाणपत्र जारी किया जाता है।

फिल्मों को किन श्रेणियों में मिलता है प्रमाणपत्र?

राज मिश्रा ने बताया कि फिल्मों को उनकी विषयवस्तु और प्रस्तुति के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में प्रमाणपत्र दिए जाते हैं। ‘यू’ (U) प्रमाणपत्र का अर्थ है कि फिल्म सभी आयु वर्ग के दर्शकों के लिए उपयुक्त है। ‘यूए’ (UA) श्रेणी की फिल्में बच्चों के लिए अभिभावकों की निगरानी में देखने योग्य मानी जाती हैं, जबकि ‘ए’ (A) प्रमाणपत्र केवल 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के दर्शकों के लिए होता है। उन्होंने कहा कि अधिक हिंसा, अपराध या संवेदनशील विषय वाली फिल्मों को आमतौर पर ‘ए’ श्रेणी में रखा जाता है, जबकि सीमित हिंसा वाली फिल्मों को ‘यूए’ प्रमाणपत्र मिल सकता है।

किन आधारों पर तय होता है सर्टिफिकेट?

CBFC सदस्य के अनुसार बोर्ड केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि फिल्म के सामाजिक प्रभाव को भी ध्यान में रखता है। समीक्षा के दौरान यह देखा जाता है कि फिल्म की कहानी, प्रस्तुति और दृश्य आज के सामाजिक परिवेश के अनुरूप हैं या नहीं। अत्यधिक हिंसा, भड़काऊ सामग्री या ऐसे दृश्य जो समाज पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं, उनकी विशेष समीक्षा की जाती है। उन्होंने कहा कि फिल्म में ऐसा कोई कंटेंट नहीं होना चाहिए जो देशविरोधी विचारों को बढ़ावा दे, सामाजिक अशांति फैलाए या लोगों को हिंसा के लिए उकसाए। रचनात्मक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाता है, लेकिन उसकी भी कुछ संवैधानिक और कानूनी सीमाएं होती हैं।

अगर फिल्म को मंजूरी न मिले तो क्या होता है?

राज मिश्रा ने बताया कि यदि प्रारंभिक पांच सदस्यीय समिति किसी फिल्म को प्रमाणपत्र देने से इनकार करती है, तो निर्माता दोबारा समीक्षा के लिए आवेदन कर सकता है। इसके बाद 11 सदस्यीय समिति फिल्म की पुनः जांच करती है। यदि वहां भी प्रमाणपत्र नहीं मिलता, तो निर्माता संबंधित न्यायिक मंच या ट्रिब्यूनल में अपील कर सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों की संख्या बहुत कम होती है और अधिकांश मामलों का समाधान बोर्ड की प्रक्रिया के भीतर ही हो जाता है।

क्या सेंसर बोर्ड पर राजनीतिक दबाव होता है?

राज मिश्रा ने इस धारणा को भी खारिज किया कि CBFC राजनीतिक दबाव में काम करता है। उन्होंने कहा कि बोर्ड के सदस्यों को पहले से यह भी नहीं बताया जाता कि उन्हें किस फिल्म की स्क्रीनिंग करनी है। स्क्रीनिंग स्थल पर पहुंचने के बाद ही फिल्म की जानकारी दी जाती है। उनके अनुसार आज तक किसी भी फिल्म को लेकर उन पर किसी राजनीतिक दल या नेता की ओर से दबाव नहीं बनाया गया। बोर्ड का मुख्य उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना होता है कि फिल्म कानून और निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुरूप हो तथा अनावश्यक रूप से सामाजिक या सांप्रदायिक तनाव पैदा न करे।

‘सतलुज’ फिल्म क्यों बनी चर्चा का विषय?

‘सतलुज’, जिसे पहले ‘पंजाब 95’ के नाम से जाना जाता था, मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन से प्रेरित फिल्म है। इसमें 1984 से 1994 के बीच कथित अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार और 1995 में खालरा के अपहरण व हत्या से जुड़े घटनाक्रम को दिखाया गया है। यही संवेदनशील विषय फिल्म के लंबे समय से प्रमाणन प्रक्रिया में रहने और विवाद का कारण बना हुआ है।

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