क्या चीन का मुकाबला कर सकती है जापान की सेना? भारत से क्यों बढ़ी रणनीतिक उम्मीदें, समझिए पूरा समीकरण
हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच जापान अपनी सैन्य क्षमताओं को लगातार मजबूत कर रहा है। चीन के बढ़ते प्रभाव और ताइवान को लेकर तनाव के बीच जापान की नई सरकार सुरक्षा सहयोग पर विशेष जोर दे रही है। ऐसे समय में जापान के प्रधानमंत्री का भारत दौरा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे इंडो-पैसिफिक की बदलती रणनीति के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।
भारत दौरा क्यों माना जा रहा है अहम?
जापान के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की सैन्य गतिविधियां और समुद्री दावेदारी लगातार बढ़ रही हैं। भारत और जापान पहले से ही विशेष रणनीतिक एवं वैश्विक साझेदार हैं और दोनों देश मुक्त, खुला तथा नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का समर्थन करते हैं। रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain), सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा और उभरती तकनीकों में सहयोग इस यात्रा के प्रमुख एजेंडों में शामिल रहने की संभावना है।
जापान अपनी सैन्य ताकत क्यों बढ़ा रहा है?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान ने शांतिवादी संविधान अपनाया था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए उसने रक्षा नीति में बड़े बदलाव किए हैं। चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति, पूर्वी चीन सागर में विवाद, ताइवान जलडमरूमध्य में तनाव और उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षणों ने जापान को रक्षा बजट बढ़ाने और लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों सहित आधुनिक हथियारों के विकास की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है।
भर्ती संकट जापानी सेना की सबसे बड़ी चुनौती
हालांकि जापान तकनीकी रूप से अत्याधुनिक सैन्य शक्ति विकसित कर रहा है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त सैनिकों की भर्ती है। देश में लगातार घटती युवा आबादी, कम बेरोजगारी, निजी क्षेत्र में बेहतर रोजगार के अवसर और बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस की प्राथमिकता के कारण सेना में भर्ती अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रही है। इसके अलावा सेना के भीतर अनुशासन और कार्यस्थल से जुड़े कुछ विवादों ने भी युवाओं की रुचि को प्रभावित किया है।
चीन और जापान की सैन्य क्षमता में कितना अंतर?
Global Firepower Index 2026 के अनुसार सैन्य क्षमता के मामले में चीन दुनिया की शीर्ष शक्तियों में शामिल है, जबकि जापान भी प्रमुख सैन्य देशों में गिना जाता है। सक्रिय सैनिकों की संख्या, रक्षा बजट, नौसैनिक जहाजों, लड़ाकू विमानों और परमाणु हथियारों के मामले में चीन स्पष्ट बढ़त रखता है। दूसरी ओर जापान की ताकत उसकी अत्याधुनिक तकनीक, आधुनिक नौसेना, उन्नत रडार प्रणाली, F-35 स्टील्थ लड़ाकू विमान और अमेरिका के साथ सुरक्षा गठबंधन मानी जाती है। इसलिए किसी संभावित संघर्ष की स्थिति में केवल संख्या नहीं, बल्कि तकनीक और रणनीतिक साझेदारियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
भारत से जापान की क्या हैं रणनीतिक अपेक्षाएं?
जापान के लिए हिंद महासागर बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके अधिकांश ऊर्जा आयात और वैश्विक व्यापारिक जहाज इसी समुद्री मार्ग से गुजरते हैं। ऐसे में वह भारत के साथ समुद्री सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करना चाहता है। इसके अलावा जापान, भारत, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के क्वाड (Quad) सहयोग को इंडो-पैसिफिक में स्थिरता बनाए रखने के लिए अहम मानता है। साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रक्षा तकनीक, अंतरिक्ष अनुसंधान और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने जैसे क्षेत्रों में भी दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ने की संभावना है।
क्या चीन के खिलाफ अकेला जापान पर्याप्त है?
विशेषज्ञों का मानना है कि जापान की सैन्य क्षमता मजबूत है, लेकिन चीन की विशाल सेना, रक्षा बजट और हथियारों की संख्या को देखते हुए अकेले सैन्य संतुलन बनाना उसके लिए चुनौतीपूर्ण होगा। इसी कारण जापान अपनी सुरक्षा रणनीति में अमेरिका के साथ गठबंधन, भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे साझेदारों के साथ सहयोग तथा बहुपक्षीय मंचों को अधिक महत्व दे रहा है। यही वजह है कि भारत-जापान रणनीतिक साझेदारी आने वाले वर्षों में इंडो-पैसिफिक की सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।