भारत और पाकिस्तान की पश्चिम एशिया नीति में क्या है फर्क? अमेरिका-ईरान समीकरण के बीच समझिए पूरा परिदृश्य
पश्चिम एशिया में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच यह सवाल चर्चा में है कि पाकिस्तान एक साथ अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संवाद बनाए रखने में कैसे सफल दिखता है, जबकि भारत अपेक्षाकृत अधिक सतर्क और संतुलित नीति अपनाता नजर आता है। हालांकि, इस विषय का कोई एक कारण या सर्वमान्य निष्कर्ष नहीं है। दोनों देशों की विदेश नीति उनके अलग-अलग रणनीतिक हितों, भौगोलिक स्थिति और सुरक्षा प्राथमिकताओं पर आधारित है।
पाकिस्तान की रणनीति को क्यों माना जा रहा है अलग?
पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका का सुरक्षा सहयोगी रहा है, वहीं भौगोलिक और धार्मिक कारणों से उसके ईरान तथा खाड़ी देशों के साथ भी संबंध बने रहे हैं। ईरान के साथ साझा सीमा और अफगानिस्तान से जुड़े सुरक्षा मुद्दों के कारण इस्लामाबाद दोनों पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि पाकिस्तान के अमेरिका या ईरान के साथ हमेशा समान रूप से सहज संबंध रहे हैं। अलग-अलग समय में उसे दोनों देशों के साथ तनाव और मतभेदों का भी सामना करना पड़ा है।
भारत की विदेश नीति क्यों रहती है अधिक संतुलित?
भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) और मल्टी-अलाइनमेंट के सिद्धांत पर आधारित रही है। नई दिल्ली एक ओर अमेरिका, इज़राइल और पश्चिमी देशों के साथ रक्षा एवं प्रौद्योगिकी सहयोग बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य पश्चिम एशियाई देशों के साथ भी अपने आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते मजबूत बनाए रखना चाहती है। इसी वजह से भारत कई संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बेहद संतुलित और सावधानीपूर्ण भाषा का इस्तेमाल करता है।
भारत के लिए पश्चिम एशिया क्यों है बेहद अहम?
भारत के लिए पश्चिम एशिया केवल कूटनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। भारत के कच्चे तेल, एलएनजी और एलपीजी आयात का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। इसके अलावा खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं, जिनके द्वारा भेजी जाने वाली विदेशी मुद्रा भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती है। यही कारण है कि भारत किसी भी एक पक्ष के साथ पूरी तरह खड़ा होने के बजाय सभी प्रमुख देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है।
क्या भारत ईरान के पक्ष में खुलकर बोल सकता था?
इस सवाल पर रणनीतिक विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत को ईरान के प्रति अधिक स्पष्ट समर्थन दिखाना चाहिए था ताकि तेहरान के साथ रिश्तों में सकारात्मक संदेश जाता। वहीं अन्य विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत के अमेरिका, इज़राइल और खाड़ी देशों के साथ भी गहरे हित जुड़े हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष का खुला समर्थन उसकी व्यापक विदेश नीति और दीर्घकालिक रणनीतिक हितों को प्रभावित कर सकता था। इसलिए भारत ने अपेक्षाकृत संयमित रुख अपनाया।
क्या पाकिस्तान को वास्तव में कूटनीतिक बढ़त मिली है?
हाल के घटनाक्रमों के बाद कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संवाद बनाए रखकर अपनी कूटनीतिक सक्रियता बढ़ाई है। हालांकि, इसे स्थायी रणनीतिक बढ़त मानना जल्दबाजी होगी। अंतरराष्ट्रीय संबंध लगातार बदलते रहते हैं और किसी भी देश की स्थिति समय, घटनाओं और वैश्विक शक्ति संतुलन के अनुसार बदल सकती है। इसलिए यह कहना कि पाकिस्तान निर्णायक रूप से आगे निकल गया है, अभी तथ्यात्मक रूप से स्थापित निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
भारत के सामने आगे की चुनौती क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को आने वाले समय में अमेरिका, ईरान, इज़राइल और खाड़ी देशों के साथ अपने रिश्तों में संतुलन बनाए रखना होगा। साथ ही ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, समुद्री संपर्क, चाबहार बंदरगाह, क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक मंचों पर अपनी भूमिका को मजबूत करने पर भी ध्यान देना होगा। बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए सभी प्रमुख साझेदारों के साथ भरोसेमंद संबंध बनाए रखना होगी।