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धार्मिक स्थलों के विवाद पर बोले पूर्व पाकिस्तानी उच्चायुक्त, 1991 के कानून का दिया हवाला

भारत में धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों के बीच पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त अब्दुल बासित का बयान चर्चा में आ गया है। उन्होंने 1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजंस) एक्ट का हवाला देते हुए कहा कि सदियों पुराने धार्मिक स्थलों के स्वरूप को बदलने की मांग उचित नहीं है। उनका यह बयान गुजरात के भरूच में एक ऐतिहासिक स्थल को लेकर उठे विवाद की पृष्ठभूमि में सामने आया है। वहीं भारत में इस कानून और इससे जुड़े मामलों पर कानूनी प्रक्रिया अलग-अलग अदालतों में जारी है।

अब्दुल बासित ने क्या कहा?

भारत में पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त रह चुके अब्दुल बासित ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि देश के विभिन्न राज्यों में ऐतिहासिक मस्जिदों को लेकर नए विवाद सामने आ रहे हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश के ज्ञानवापी, संभल और अन्य मामलों के साथ गुजरात के भरूच का भी उल्लेख किया। बासित का कहना था कि यदि किसी धार्मिक स्थल का इतिहास कई सौ वर्ष पुराना है, तो वर्तमान समय में उसके स्वरूप को बदलने की मांग पर गंभीर कानूनी और सामाजिक सवाल खड़े होते हैं।

भरूच विवाद का किया जिक्र

अपने संबोधन में अब्दुल बासित ने गुजरात के भरूच स्थित एक ऐतिहासिक मस्जिद का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि कुछ रिपोर्टों और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में दावा किया गया है कि यह मस्जिद किसी प्राचीन जैन मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ऐसे दावों की सत्यता का निर्धारण ऐतिहासिक रिकॉर्ड और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही हो सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कई सदियों पुराने मामलों को वर्तमान समय में दोबारा विवाद का विषय बनाया जाना चाहिए।

1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट का दिया हवाला

अब्दुल बासित ने अपने बयान में प्लेसेस ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजंस) एक्ट, 1991 का उल्लेख किया। इस कानून के अनुसार, 15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल का जो स्वरूप था, उसे यथावत बनाए रखने का प्रावधान है और सामान्य परिस्थितियों में उसका धार्मिक चरित्र नहीं बदला जा सकता। हालांकि इस कानून को लेकर भारत में लंबे समय से कानूनी और संवैधानिक बहस जारी है तथा इसकी विभिन्न धाराओं को चुनौती देने वाली याचिकाएं न्यायालयों में लंबित हैं।

धार्मिक स्थलों को लेकर जारी है कानूनी प्रक्रिया

देश में ज्ञानवापी, शाही ईदगाह, संभल और अन्य ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों से जुड़े कई मामले अदालतों में विचाराधीन हैं। विभिन्न पक्ष अपने-अपने ऐतिहासिक और कानूनी तर्क पेश कर रहे हैं। ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय न्यायपालिका द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर किया जाना है। इसलिए इन विवादों पर किसी भी दावे या प्रतिदावे की पुष्टि अदालत के अंतिम फैसले के बाद ही मानी जाएगी।

राजनीतिक और सामाजिक बहस का बना विषय

धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का भी हिस्सा बन चुके हैं। एक पक्ष ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर धार्मिक स्थलों की पुनर्स्थापना की मांग करता है, जबकि दूसरा पक्ष 1991 के कानून का हवाला देते हुए यथास्थिति बनाए रखने की बात करता है। ऐसे में यह मुद्दा आने वाले समय में भी न्यायिक और सार्वजनिक बहस का केंद्र बना रह सकता है।

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