AMCA इंजन विवाद: क्या GE की बढ़ी कीमत भारत के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की राह में रोड़ा बनेगी?
भारत का महत्वाकांक्षी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोजेक्ट एक बार फिर चर्चा में है। अमेरिकी कंपनी GE के F414 इंजन की कीमत और तकनीक हस्तांतरण (Technology Transfer) को लेकर सामने आई रिपोर्टों ने इस स्वदेशी स्टेल्थ फाइटर जेट की समयसीमा और लागत पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इंजन चयन से जुड़ी देरी भविष्य में पूरे कार्यक्रम को प्रभावित कर सकती है।
AMCA के लिए क्यों अहम है GE F414 इंजन?
AMCA भारत का पहला स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ लड़ाकू विमान होगा, जिसे भारतीय वायुसेना की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा है। शुरुआती प्रोटोटाइप के लिए GE F414 इंजन को चुना गया है, जो तेजस Mk-2 कार्यक्रम का भी प्रमुख हिस्सा है। यह इंजन विश्वसनीय और पहले से प्रमाणित प्लेटफॉर्म माना जाता है। हालांकि, इसकी लागत और स्थानीय उत्पादन व्यवस्था को लेकर चल रही बातचीत में कथित अड़चनों ने परियोजना की दिशा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
कीमत और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर बना विवाद का केंद्र
रिपोर्ट्स के अनुसार, GE ने इंजन की कीमत पहले के अनुमानों की तुलना में काफी अधिक बताई है। साथ ही भारत में असेंबली और उत्पादन सुविधाएं स्थापित करने के लिए अतिरिक्त निवेश की मांग भी चर्चा का विषय बनी हुई है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रक्षा क्षेत्र में इसे लेकर व्यापक बहस चल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक रक्षा उद्योग में बढ़ती लागत, सप्लाई चेन चुनौतियां और उन्नत तकनीक की कीमतें इस स्थिति की एक वजह हो सकती हैं।
क्या प्रोटोटाइप और अंतिम विमान में अलग इंजन हो सकता है?
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार AMCA के शुरुआती परीक्षणों के लिए एक प्रमाणित इंजन का इस्तेमाल करना व्यावहारिक रणनीति हो सकती है। लेकिन चुनौती तब आती है जब अंतिम उत्पादन संस्करण में किसी दूसरे इंजन को शामिल करने की योजना बनाई जाती है। आधुनिक स्टेल्थ लड़ाकू विमानों में इंजन केवल शक्ति का स्रोत नहीं होता, बल्कि विमान के एयरफ्रेम, एयर इनटेक, संतुलन, थर्मल सिग्नेचर और स्टेल्थ डिजाइन से भी सीधे जुड़ा होता है। ऐसे में बाद में इंजन बदलना तकनीकी रूप से बेहद जटिल और समय लेने वाला कार्य बन सकता है।
भारत के सामने क्या हैं विकल्प?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि GE के साथ समझौता लंबा खिंचता है तो भारत को अन्य विकल्पों पर भी विचार करना पड़ सकता है। इनमें ब्रिटेन का EJ-200 इंजन और फ्रांस के उन्नत इंजन प्लेटफॉर्म शामिल हैं। हालांकि किसी भी नए इंजन को अपनाने का मतलब विमान के डिजाइन और कई महत्वपूर्ण प्रणालियों में बदलाव करना होगा। इससे परियोजना की लागत और समयसीमा दोनों प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए किसी भी वैकल्पिक फैसले को बेहद सावधानी से लेने की आवश्यकता होगी।
2035 की समयसीमा पर कितना असर पड़ सकता है?
AMCA कार्यक्रम की योजना के अनुसार अगले कुछ वर्षों में प्रोटोटाइप तैयार कर उसकी पहली उड़ान कराई जानी है। यदि इंजन से जुड़ा विवाद जल्द सुलझ जाता है तो परियोजना की समयसीमा पर सीमित असर पड़ेगा। लेकिन इंजन चयन को लेकर लंबी अनिश्चितता प्रोटोटाइप निर्माण, ग्राउंड टेस्टिंग, फ्लाइट ट्रायल और उत्पादन कार्यक्रम को पीछे धकेल सकती है। रक्षा परियोजनाओं के इतिहास को देखते हुए ऐसी देरी कई वर्षों तक बढ़ सकती है।
स्वदेशी इंजन विकास ही स्थायी समाधान
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने एवियोनिक्स, रडार, मिशन कंप्यूटर और कंपोजिट संरचनाओं जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन लड़ाकू विमान इंजनों में आत्मनिर्भरता अभी भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। जब तक भारत पूरी तरह स्वदेशी और उच्च क्षमता वाले टर्बोफैन इंजन का विकास नहीं कर लेता, तब तक विदेशी कंपनियों पर निर्भरता बनी रहेगी। AMCA केवल एक लड़ाकू विमान परियोजना नहीं, बल्कि भारतीय एयरोस्पेस उद्योग की तकनीकी क्षमता और आत्मनिर्भरता की बड़ी परीक्षा भी है।