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कुएं में मिली नवजात ने खड़े किए समाज पर सवाल, इंसानियत फिर हुई शर्मसार

Tijara के पालपुर रोड स्थित एक कुएं से नवजात बच्ची का जिंदा मिलना सिर्फ एक पुलिस मामला नहीं, बल्कि समाज की संवेदनहीन सोच का दर्दनाक आईना बन गया है। राहगीरों को कुएं से रोने की आवाज सुनाई दी तो ग्रामीणों की मदद से बच्ची को बाहर निकाला गया। फिलहाल बच्ची सुरक्षित है और उसका इलाज जारी है, लेकिन इस घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी या मानसिकता थी, जिसने एक मासूम को मौत के मुंह में धकेलने की कोशिश की?

कुएं से आई रोने की आवाज, बच गई मासूम की जान

घटना उस समय सामने आई जब पालपुर रोड से गुजर रहे कुछ लोगों को कुएं के अंदर से बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। लोगों ने नीचे झांककर देखा तो एक नवजात बच्ची जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करती दिखाई दी। सूचना मिलते ही ग्रामीण मौके पर पहुंचे और बिना समय गंवाए रेस्क्यू शुरू किया गया। रस्सियों के सहारे एक युवक कुएं में उतरा और बच्ची को तौलिए में लपेटकर सुरक्षित बाहर लेकर आया। इस दौरान मौके पर मौजूद लोगों की सांसें थमी रहीं। बच्ची के बाहर आते ही हर किसी ने राहत की सांस ली।

अस्पताल में भर्ती, पुलिस जांच में जुटी

घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और बच्ची को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने उसकी स्थिति स्थिर बताई और बेहतर इलाज के लिए उसे अलवर रेफर कर दिया। पुलिस के अनुसार, बच्ची को कुएं में किसने और क्यों फेंका, इसकी जांच की जा रही है। फिलहाल कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई है, लेकिन आसपास के क्षेत्रों में पूछताछ और जांच जारी है। पुलिस आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों और स्थानीय लोगों से जानकारी जुटाने का प्रयास कर रही है।

बेटी होने की सजा या सामाजिक डर?

यह घटना सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि समाज की सोच पर बड़ा सवाल है। क्या इस बच्ची का कसूर सिर्फ इतना था कि वह बेटी थी? या फिर गरीबी, सामाजिक दबाव, दहेज और तथाकथित इज्जत के डर ने किसी को इतना कठोर बना दिया कि उसने एक मासूम को कुएं में फेंक दिया? समाज में आज भी कई जगह बेटियों को बोझ समझने की मानसिकता मौजूद है। यही वजह है कि सरकारों के जागरूकता अभियान और कानूनों के बावजूद ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। यह मामला उस सोच को बदलने की जरूरत की ओर इशारा करता है, जो बेटियों के अस्तित्व पर सवाल खड़े करती है।

समाज को खुद से पूछने होंगे सवाल

नवजात बच्ची फिलहाल सुरक्षित है, लेकिन इस घटना ने इंसानियत को कठघरे में खड़ा कर दिया है। एक तरफ समाज बेटियों के सम्मान और सुरक्षा की बातें करता है, वहीं दूसरी ओर ऐसी घटनाएं संवेदनाओं को झकझोर देती हैं। जरूरत सिर्फ दोषियों को पकड़ने की नहीं, बल्कि उस मानसिकता को बदलने की है, जो बेटियों को अभिशाप मानती है। जब तक समाज अपनी सोच नहीं बदलेगा, तब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे। यह घटना हर व्यक्ति को यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं।

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