“गौभक्ति बनाम ‘नीलगाय नीति’: राजस्थान में 30 साल पुराना आदेश फिर विवादों में, रामनवमी पर उठा विरोध”
राजस्थान में नीलगाय को अनुमति लेकर मारने के पुराने सरकारी आदेश के खिलाफ एक बार फिर विरोध तेज हो गया है। रामनवमी के दिन दिगम्बर जैन जिला समिति द्वारा राजस्थान नील गाय रक्षा समिति के समर्थन सहित सामाजिक संगठनों और गौ-रक्षा से जुड़े लोगों ने धरना देकर इस कानून को रद्द करने की मांग उठाई। सवाल उठ रहा है कि खुद को गौभक्त बताने वाली सरकार आखिर नीलगाय—जिसके नाम में ही ‘गाय’ है—की हत्या की अनुमति क्यों दे रही है।
रामनवमी के दिन यह धरना आस्था बनाम आदेश पर केंद्रित रहा ।
रामनवमी जैसे धार्मिक अवसर पर मन्नी का बड़ पर जुटे लोगों ने सरकार की नीतियों पर सीधा सवाल खड़ा किया। समाजसेवी ओम प्रकाश गुप्ता के नेतृत्व में चल रहे “नीलगाय बचाओ आंदोलन” ने एक बार फिर जोर पकड़ा। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब पूरे देश में गाय को पूजनीय माना जाता है, तब नीलगाय को मारने की अनुमति देना न सिर्फ विरोधाभासी है बल्कि आस्था के साथ भी खिलवाड़ है। धरने में शामिल लोगों ने सरकार से इस आदेश को तत्काल निरस्त करने की मांग की।
इस धरने में भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपत सिंह बाल्यान ,अखिल भारतीय किसान महा पंचायत के जिला अध्यक्ष वीरेंद्र चौधरी ,राजस्थान किसान सभा अध्यक्ष भोलाराम सहित तमाम संगठनों ने किसानों की आड़ में माफिया काम कर रहा है इस कानून को रद्द किया जाना चाहिए ।
1994 का आदेश: फसल बचाने के नाम पर ‘खुली छूट’?
राजस्थान सरकार द्वारा 31 मार्च 1994 को जारी अधिसूचना में नीलगाय को मारने की अनुमति दी गई थी, वह भी संबंधित अधिकारियों की इजाजत से। बाद के वर्षों में इस आदेश को और आसान बनाते हुए अधिकारों का दायरा बढ़ा दिया गया—रेंजर से लेकर कलेक्टर, एसपी और यहां तक कि थानेदार तक। यानी कागजों में “नियंत्रित अनुमति” का दावा, लेकिन जमीनी हकीकत में यह व्यवस्था कितनी पारदर्शी रही, यह खुद एक बड़ा सवाल है।
सरकार की ‘गौ नीति’ पर उठते सवाल
एक ओर सरकार खुद को गौ-रक्षक बताती है, दूसरी ओर नीलगाय के मामले में यह ढील आखिर क्यों? विरोध करने वालों का कहना है कि यदि नीलगाय को गाय की श्रेणी में नहीं भी रखा जाए, तब भी वह एक वन्यजीव है, जिसकी रक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। सवाल यही है कि जहां भाषणों में ‘गाय हमारी माता है’ कहा जाता है, वहीं नीतियों में ‘नीलगाय’ को गोली का रास्ता दिखाया जाता है।
क्या किसान सच में चाहते हैं नीलगाय की हत्या?
सरकार ने यह आदेश फसलों को बचाने के नाम पर दिया था, लेकिन आंदोलनकारियों का दावा है कि ज्यादातर किसान खुद इस नीति के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि अब तारबंदी और अन्य उपायों के कारण फसलों को होने वाला नुकसान काफी कम हो गया है। ऐसे में नीलगाय को मारने की जरूरत नहीं है। उल्टा किसान कई बार इन जानवरों को बचाने का प्रयास करते हैं, क्योंकि ग्रामीण जीवन में पशुओं के प्रति संवेदनशीलता आज भी जिंदा है।
नीलगाय के नाम पर ‘माफिया राज’ का आरोप
विरोध करने वाले संगठन आरोप लगा रहे हैं कि इस कानून की आड़ में अवैध शिकार और तस्करी का धंधा पनप रहा है। नीलगाय के मांस, खाल और हड्डियों की तस्करी के मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं। 2024 में जयपुर के जयसिंहपुरा खोर इलाके में पुलिस ने नीलगाय शिकार के मामले में आरोपियों को गिरफ्तार कर हथियार और शव बरामद किए थे। ऐसे मामलों से यह संदेह और गहरा जाता है कि कहीं “अनुमति” का यह रास्ता अवैध कारोबारियों के लिए ढाल तो नहीं बन गया है।
तीन दशक बाद भी क्यों कायम है यह आदेश?
करीब 30 साल पुराने इस कानून के खिलाफ साधु-संतों, जैन मुनियों और सामाजिक संगठनों ने सैकड़ों ज्ञापन दिए, लेकिन आदेश जस का तस बना हुआ है। सवाल यह है कि जब सरकारें बदलती रहीं, नीतियां बदलती रहीं, तो यह एक आदेश क्यों अडिग रहा? क्या यह प्रशासनिक जड़ता है या फिर किसी और कारण से इसे छुआ तक नहीं गया?
मूल सवाल: मूक पशु या ‘नीति का शिकार’?
पूरे विवाद के केंद्र में एक ही सवाल खड़ा है—क्या नीलगाय सिर्फ एक ‘समस्या’ है या एक जीव, जिसकी रक्षा भी उतनी ही जरूरी है? विरोध करने वालों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक पशु का नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों की संवेदनशीलता का भी है। आखिर कब तक एक मूक प्राणी को “फसल सुरक्षा” के नाम पर बलि का बकरा बनाया जाता रहेगा?