न्यायपालिका में भ्रष्टाचार वाला चैप्टर विवाद में: क्या दुनिया के स्कूलों में भी पढ़ाया जाता है ऐसा पाठ?
कक्षा 8 की सोशल साइंस किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक वाले अध्याय को लेकर देश में बड़ी बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर स्वतः संज्ञान लेते हुए एनसीईआरटी को कड़ी टिप्पणी की है। अब सवाल सिर्फ एक किताब का नहीं, बल्कि यह है कि दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों में स्कूल स्तर पर न्यायपालिका को किस तरह पढ़ाया जाता है—आदर्श संस्था के रूप में या उसकी कमियों सहित?
⚖️ सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक के उस अध्याय पर आपत्ति जताई जिसमें अदालतों में लंबित मामलों और न्यायाधीशों की कमी का जिक्र किया गया था। अदालत ने कहा कि इस तरह की प्रस्तुति न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचा सकती है और जनता के भरोसे को कमजोर कर सकती है।
कोर्ट ने एनसीईआरटी से स्पष्टीकरण और प्रेस नोट जारी कर माफी मांगने को भी कहा।
यह मामला शिक्षा सामग्री और संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा के बीच संतुलन की बहस को सामने लाता है।
🌍 बड़ा सवाल: दुनिया में क्या पढ़ाया जाता है?
विवाद के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या दुनिया के दूसरे लोकतांत्रिक देशों में भी स्कूल स्तर पर न्यायपालिका की आलोचना या भ्रष्टाचार पर अलग अध्याय पढ़ाए जाते हैं।
वैश्विक तुलना बताती है कि अधिकांश देशों में स्कूल पाठ्यक्रम संस्थाओं की भूमिका और लोकतांत्रिक मूल्यों पर केंद्रित होते हैं, न कि सीधे आरोप आधारित आलोचना पर।
यह बहस शिक्षा बनाम संस्थागत सम्मान की वैश्विक बहस से जुड़ती है।
🇺🇸 अमेरिका का मॉडल: सिस्टम समझाया जाता है, विवाद नहीं
अमेरिका में स्कूलों में ‘सिविक्स’ या ‘गवर्नमेंट’ विषय के तहत संविधान, अधिकारों और सरकार की तीनों शाखाओं—कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका—की भूमिका पढ़ाई जाती है।
छात्रों को जजों की नियुक्ति, सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां और ‘चेक्स एंड बैलेंस’ की अवधारणा समझाई जाती है।
हालांकि, मुख्यधारा की स्कूल किताबों में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” नाम से अलग अध्याय नहीं मिलता।
अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था संस्थागत प्रक्रियाओं पर ध्यान देती है, व्यक्तिगत या संस्थागत आरोपों पर नहीं।
🇬🇧 ब्रिटेन की शिक्षा व्यवस्था कैसी?
ब्रिटेन के सेकेंडरी स्कूलों में ‘सिटिजनशिप’ और ‘पॉलिटिक्स’ विषय पढ़ाया जाता है। इसमें कानून का शासन, अदालतों की स्वतंत्रता और लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका समझाई जाती है।
भ्रष्टाचार का जिक्र व्यापक प्रशासनिक या राजनीतिक पारदर्शिता के संदर्भ में आता है, लेकिन न्यायपालिका को केंद्र में रखकर अलग पाठ आम नहीं है।
ब्रिटेन में पाठ्यक्रम का उद्देश्य लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास और समझ विकसित करना होता है।
🇪🇺 यूरोप और अन्य देशों की स्थिति
यूरोप के कई देशों में नागरिक शास्त्र के माध्यम से अदालतों की संरचना, नागरिक अधिकार और कानून व्यवस्था पढ़ाई जाती है।
भ्रष्टाचार को सामाजिक या नैतिक मुद्दे के रूप में समझाया जाता है, लेकिन न्यायपालिका पर केंद्रित अलग अध्याय आमतौर पर शामिल नहीं किए जाते। पाठ्यपुस्तकों की राजनीतिक संतुलन के आधार पर सख्त समीक्षा होती है।
संवेदनशील संस्थाओं पर स्कूल स्तर पर सीधे आलोचनात्मक सामग्री शामिल करने से अक्सर बचा जाता है।
📊 वैश्विक तस्वीर क्या बताती है?
दुनिया के अधिकांश बड़े लोकतंत्रों में स्कूल शिक्षा का उद्देश्य संस्थाओं की बुनियादी समझ और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करना होता है। जवाबदेही और नैतिकता पढ़ाई जाती है, लेकिन न्यायपालिका को “भ्रष्टाचार” के शीर्षक से पढ़ाना सामान्य प्रथा नहीं है।
ऐसी गहन आलोचनात्मक चर्चा आमतौर पर विश्वविद्यालय स्तर पर कानून और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई में होती है।
भारत में उठा विवाद शिक्षा नीति, अभिव्यक्ति की सीमा और संस्थागत सम्मान के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है।
🧠 शिक्षा बनाम संस्थागत प्रतिष्ठा की बहस
भारत में सामने आया यह मामला सिर्फ एक पाठ्यपुस्तक विवाद नहीं बल्कि लोकतंत्र में शिक्षा की भूमिका को लेकर बड़ा प्रश्न है—क्या छात्रों को संस्थाओं की कमियां भी बताई जानी चाहिए या केवल आदर्श मॉडल?
वैश्विक अनुभव बताता है कि अधिकांश देश स्कूल स्तर पर संतुलित और संस्थागत दृष्टिकोण अपनाते हैं।