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95 साल बाद बदल रहा पीएमओ: साउथ ब्लॉक से ‘सेवा तीर्थ’ तक का सफर…

देश की सत्ता का सबसे अहम दफ्तर—प्रधानमंत्री कार्यालय—अब 95 साल बाद अपनी पारंपरिक जगह छोड़ रहा है। नरेंद्र मोदी, जो पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद सबसे लंबे समय तक लगातार पीएमओ में बैठने वाले प्रधानमंत्री हैं, अब ‘साउथ ब्लॉक’ की बजाय ‘सेवा तीर्थ’ कॉम्प्लेक्स से काम करेंगे।


नेहरू से शुरुआत: पीएमओ का शुरुआती दौर

आज जिसे हम पीएमओ कहते हैं, उसे नेहरू के समय में “Prime Minister’s Secretariat” या PMS कहा जाता था। जवाहरलाल नेहरू के दौर में यह पूरी तरह सत्ता का केंद्र नहीं बन पाया। माना जाता है कि नेहरू इसे मजबूत बनाना चाहते थे, लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रभाव के चलते सत्ता संतुलित रही।


इंदिरा गांधी के समय बढ़ी ताकत

इंदिरा गांधी के कार्यकाल में पीएमओ बेहद प्रभावशाली हो गया। आपातकाल के दौरान तो यह समानांतर सत्ता केंद्र की तरह काम करने लगा था।
लाल बहादुर शास्त्री के समय से ही पीएम सचिवालय एक अलग प्रशासनिक इकाई जैसा बन चुका था, लेकिन इंदिरा गांधी के दौर में इसकी शक्ति और दायरा दोनों बढ़ गए।


मोदी युग में बदलाव: वैश्विक मॉडल से प्रेरणा

नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में सिर्फ पीएमओ की भौतिक लोकेशन ही नहीं बदली, बल्कि काम करने की शैली भी बदली। जेएनयू के प्रोफेसर हिमांशु रॉय की किताब PMO: Prime Minister’s Office Through the Years में उल्लेख है कि मोदी प्रशासनिक मामलों में ली कुआन यू से सलाह लेते थे।
इसके अलावा वे बड़ौदा के शासक सायाजीराव गायकवाड़ से भी प्रशासनिक प्रेरणा लेते रहे हैं।


डिजिटल गवर्नेंस पर जोर

मोदी सरकार ने डिजिटल प्लेटफॉर्म का भरपूर इस्तेमाल किया। MyGov जैसे ऐप के जरिए जनता से सुझाव लेकर उन्हें संबंधित मंत्रालयों तक भेजा जाता है।
वरिष्ठ पत्रकार उदय माहूरकर के अनुसार, सुझावों को डेटा के रूप में प्रोसेस कर मंत्रालयों और पीएमओ तक पहुंचाया जाता है। यदि सुझाव व्यवहारिक होता है, तो उसे नीति स्तर पर आगे बढ़ाया जाता है।


अफसरों के चयन में नया मॉडल

मोदी ने अफसरों के चयन में पारंपरिक ACR (Annual Confidential Report) आधारित प्रणाली से हटकर “रियल-टाइम रेटिंग” मॉडल अपनाया। यह मॉडल न्यूजीलैंड की प्रशासनिक प्रणाली से प्रेरित बताया जाता है।
कॉरपोरेट शैली से प्रेरित चार मुख्य पैमानों पर अफसरों का मूल्यांकन कर उन्हें “रिटेंशन पूल” में डाला जाता है। इसके बाद सेंट्रल सर्विसेज बोर्ड और कैबिनेट की अपॉइंटमेंट कमेटी (ACC) से अंतिम मंजूरी ली जाती है।


स्टाफ और प्रभाव: समय के साथ बढ़ता दायरा

नेहरू के दौर में पीएम सचिवालय में लगभग 117 कर्मचारी थे। 1968-69 में यह संख्या बढ़कर लगभग 200 हो गई। इंदिरा गांधी के समय प्रभाव और अधिकार दोनों चरम पर पहुंचे।
हालांकि जनता पार्टी सरकार के आने के बाद पीएमओ के अधिकार और स्टाफ में कमी की गई।


निष्कर्ष: सेवा तीर्थ से नई शुरुआत?

साउथ ब्लॉक से ‘सेवा तीर्थ’ तक का यह बदलाव सिर्फ भवन परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रशासनिक सोच और कार्यशैली में बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
अब देखना होगा कि नई लोकेशन से पीएमओ की कार्यप्रणाली और अधिक केंद्रीकृत होती है या तकनीक-आधारित प्रशासनिक मॉडल को और मजबूती मिलती है।

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